Hazaribagh: इस साल कमजोर मानसून ने हजारीबाग जल संसाधन जोन के जलाशयों में पानी की स्थिति को चिंता में डाल दिया है. 26 अगस्त 2026 तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार हजारीबाग, चतरा, कोडरमा और रामगढ़ के 17 मध्यम एवं लघु सिंचाई जलाशय अपनी क्षमता के अनुसार नहीं भर पाए हैं. इन जलाशयों में फिलहाल औसतन करीब 65 प्रतिशत पानी ही उपलब्ध है. आधे से अधिक जलाशयों में जलस्तर 70 प्रतिशत से नीचे है. ऐसे में आने वाले रबी मौसम में किसानों के सामने सिंचाई संकट खड़ा होने की आशंका बढ़ गई है. जोन के मुख्य अभियंता विजय भगत की ओर से जारी ताजा रिपोर्ट में कोनार और केसो डैम अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में हैं, लेकिन पंचखेरो, चापी, दुलकी, सलैया समेत कई जलाशयों में पानी का स्तर काफी कम है. विभाग के अनुसार करीब 12 हजार हेक्टेयर कृषि क्षेत्र में रबी फसलों की सिंचाई प्रभावित हो सकती है.
छड़वा और तिलैया इस आंकड़े में शामिल नहीं
विभाग ने स्पष्ट किया है कि जारी आंकड़ों में हजारीबाग का छड़वा डैम और कोडरमा का तिलैया डीवीसी डैम शामिल नहीं हैं. दोनों बड़े जलाशय अलग परिक्षेत्र के अंतर्गत आते हैं, इसलिए हजारीबाग जल संसाधन जोन की स्थिति का आकलन इन दोनों जलाशयों को छोड़कर किया गया है.

कोनार डैम में सबसे ज्यादा पानी, 92 प्रतिशत भरा
जोन के जलाशयों में हजारीबाग का कोनार डैम सबसे मजबूत स्थिति में है. इसकी कुल जलधारण क्षमता 233.50 एमसीएम है, जबकि 26 अगस्त तक इसमें 215.20 एमसीएम पानी उपलब्ध है. यानी डैम करीब 92 प्रतिशत भरा हुआ है. कोडरमा का केसो डैम 71 प्रतिशत जलस्तर के साथ बेहतर स्थिति में है. लोतिया डैम में 73 प्रतिशत, अंजनवा में 70 प्रतिशत और बरही डैम में 69 प्रतिशत पानी उपलब्ध है. इन जलाशयों को छोड़ दें तो अधिकांश डैमों में पानी का स्तर तेजी से नीचे आता दिखाई दे रहा है.
आधे से अधिक जलाशय 70 प्रतिशत से नीचे
आंकड़ों के मुताबिक चतरा के बोख्सा डैम में 68 प्रतिशत, घघरा में 65 प्रतिशत और हीरू में 62 प्रतिशत पानी है. रामगढ़ के नलकरी और गोंदा डैम 64-64 प्रतिशत पर हैं, जबकि जमुनिया में 61 प्रतिशत और चापी में महज 57 प्रतिशत पानी बचा है. कोडरमा का पंचखेरो डैम सबसे कमजोर स्थिति में है. यहां कुल क्षमता का केवल 54 प्रतिशत पानी उपलब्ध है. दुलकी और सलैया डैम में भी जलस्तर करीब 60 से 61 प्रतिशत के आसपास है. इन जलाशयों में फिलहाल इतनी मात्रा में पानी नहीं है कि आगामी लंबे रबी मौसम की सिंचाई को लेकर पूरी तरह आश्वस्त हुआ जा सके.
जुलाई में करीब 20 दिन बारिश का लंबा ब्रेक बना बड़ी वजह
जल संसाधन विभाग के अनुसार जलाशयों में अपेक्षा से कम पानी जमा होने की पहली बड़ी वजह मानसून का लंबा ब्रेक है. जुलाई के दूसरे पखवाड़े में करीब 20 दिनों तक पर्याप्त बारिश नहीं हुई. इसका सीधा असर जलाशयों के कैचमेंट क्षेत्र पर पड़ा. बारिश नहीं होने से जलग्रहण क्षेत्र में पानी का प्रवाह कम रहा और डैमों में अपेक्षित मात्रा में पानी नहीं पहुंच सका. मानसून के शुरुआती दौर में हुई बारिश के बाद जलाशयों में पानी की स्थिति बेहतर होने की उम्मीद थी, लेकिन बारिश के लंबे अंतराल ने उस उम्मीद को कमजोर कर दिया। अगस्त में हुई बारिश के बावजूद कई छोटे जलाशय अपनी क्षमता के मुकाबले काफी पीछे रह गए.
वर्षों से डिसिल्टिंग नहीं, 15 से 20 प्रतिशत तक घट गई क्षमता
विभाग ने जलाशयों की कम जलधारण क्षमता के पीछे वर्षों से लंबित डिसिल्टिंग को भी बड़ी वजह बताया है. अधिकारियों के अनुसार अधिकांश छोटे जलाशयों की पांच से सात वर्षों से सफाई नहीं हुई है. जलाशयों में लगातार मिट्टी और गाद जमा होने से उनकी वास्तविक जलधारण क्षमता प्रभावित हुई है. विभाग का अनुमान है कि गाद जमने के कारण कई जलाशयों की जलधारण क्षमता करीब 15 से 20 प्रतिशत तक कम हो चुकी है. ऐसे में सामान्य बारिश होने के बावजूद जलाशय पहले की तुलना में कम पानी रोक पा रहे हैं.
अतिक्रमण और लीकेज से भी पानी का नुकसान
जलाशयों की खराब स्थिति के पीछे अतिक्रमण और लीकेज को भी जिम्मेदार माना गया है. पहाड़ी और कैचमेंट क्षेत्रों में पेड़ों की कटाई से बारिश का पानी तेजी से बहकर निकल जाता है. इससे जलाशयों में पानी पहुंचने की प्रक्रिया प्रभावित होती है. इसके अलावा कुछ जलाशयों के फाटकों से लगातार रिसाव की शिकायत भी सामने आती रही है. विभाग के सामने चुनौती केवल बारिश के पानी को जलाशयों तक पहुंचाने की नहीं, बल्कि उपलब्ध पानी को लंबे समय तक सुरक्षित रखने की भी है.
पंचखेरो, चापी और दुलकी में सबसे ज्यादा चिंता
कम जलस्तर वाले जलाशयों में पंचखेरो, चापी, दुलकी और सलैया की स्थिति किसानों के लिए चिंता का विषय बन रही है. विभाग के अनुसार दुलकी, चापी, पंचखेरो, सलैया समेत छह जलाशय 60 प्रतिशत या उससे कम स्तर पर हैं.
इन जलाशयों के कमांड एरिया में रबी मौसम में गेहूं, चना समेत अन्य फसलों की सिंचाई प्रभावित होने की आशंका है. करीब 12 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई संकट की संभावना जताई गई है. चतरा के हीरू और घघरा जलाशयों पर निर्भर करीब 40 गांवों में भी धान कटाई के बाद पानी की उपलब्धता सीमित रहने की आशंका है.
कोनार-केसो से 25 हजार हेक्टेयर को राहत की उम्मीद
हालांकि पूरे परिक्षेत्र की तस्वीर निराशाजनक नहीं है. कोनार डैम में 215.20 एमसीएम और केसो डैम में 19.02 एमसीएम पानी उपलब्ध है. इन दोनों जलाशयों के बेहतर जलस्तर से हजारीबाग और रामगढ़ के करीब 25 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में रबी सिंचाई की उम्मीद बनी हुई है. इससे इन दोनों जलाशयों पर निर्भर किसानों को फिलहाल अपेक्षाकृत राहत है. हालांकि विभाग उपलब्ध पानी के इस्तेमाल को लेकर सावधानी बरत रहा है, क्योंकि रबी मौसम लंबा होता है और सिंचाई के साथ पेयजल की जरूरत भी बनी रहती है.
पहले पेयजल, फिर रोस्टर के अनुसार सिंचाई
जल संसाधन जोन के मुख्य अभियंता विजय भगत ने कहा कि छड़वा और तिलैया को छोड़कर जोन के 17 जलाशयों में फिलहाल औसतन 65 प्रतिशत पानी उपलब्ध है. उन्होंने कहा कि कोनार और केसो में स्थिति अच्छी है, लेकिन पंचखेरो, चापी और दुलकी जैसे जलाशयों में पानी कम है. उनके अनुसार कम बारिश इसका सबसे बड़ा कारण है. सभी कार्यपालक अभियंताओं को निर्देश दिया गया है कि जलाशयों में उपलब्ध पानी से पहले पेयजल की जरूरत सुरक्षित रखी जाए. इसके बाद रोस्टर तैयार कर किसानों को सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराया जाए.
डिसिल्टिंग का प्रस्ताव सरकार को भेजा
मुख्य अभियंता ने बताया कि कम पानी वाले जलाशयों की डिसिल्टिंग के लिए सरकार को प्रस्ताव भेजा गया है. जलाशयों से गाद हटने के बाद उनकी वास्तविक जलधारण क्षमता बढ़ाने में मदद मिलेगी और भविष्य में कम बारिश की स्थिति में भी अधिक पानी सुरक्षित रखा जा सकेगा. विभाग ने किसानों से भी कम पानी में तैयार होने वाली फसलों को प्राथमिकता देने की अपील की है. खासकर सरसों और चना जैसी फसलों की खेती को प्रोत्साहित किया जा रहा है, ताकि उपलब्ध सिंचाई जल पर दबाव कम हो.
तालाब-डोभा बनाने वाले किसानों को सोलर पंप का लाभ
विभाग के अनुसार जिन किसानों ने अपने स्तर पर तालाब और डोभा का निर्माण कराया है, उन्हें सोलर पंप पर अनुदान का लाभ दिया जाएगा. इससे किसान स्थानीय स्तर पर उपलब्ध जलस्रोतों का इस्तेमाल सिंचाई के लिए कर सकेंगे और बड़े जलाशयों पर निर्भरता कुछ कम हो सकती है.
सितंबर की बारिश पर टिकी बड़ी उम्मीद
फिलहाल जल संसाधन विभाग की नजर सितंबर में होने वाली बारिश पर है. विभाग का अनुमान है कि यदि सितंबर में करीब 50 मिमी अतिरिक्त बारिश हो जाती है, तो हजारीबाग परिक्षेत्र के अधिकांश जलाशयों का जलस्तर 75 प्रतिशत से ऊपर पहुंच सकता है. यानी आने वाले दिनों की बारिश जलाशयों और किसानों दोनों के लिए निर्णायक साबित हो सकती है. पर्याप्त बारिश हुई तो रबी सिंचाई संकट काफी हद तक टल सकता है, लेकिन यदि सितंबर में भी बारिश कमजोर रही तो कम जलस्तर वाले जलाशयों के कमांड एरिया में सिंचाई को लेकर विभाग को सख्त जल प्रबंधन और रोस्टर आधारित आपूर्ति का सहारा लेना पड़ेगा. फिलहाल विभाग की प्राथमिकता पेयजल सुरक्षा बनाए रखने, उपलब्ध पानी को संरक्षित करने और जरूरत के अनुसार संतुलित तरीके से सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराने की है. जलाशयों में कम पानी ने रबी फसल के लिए चिंता जरूर बढ़ा दी है, लेकिन सितंबर की बारिश किसानों के लिए राहत की सबसे बड़ी उम्मीद बनी हुई है.
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