विनीत आभा उपाध्याय

Ranchi: झारखंड हाईकोर्ट ने अपने एक मामले की सुनवाई करते हुए यह स्पष्ट किया है कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A के तहत अपराध दर्ज करने या सिद्ध करने के लिए केवल दहेज की मांग का होना ही अनिवार्य नहीं है. अदालत ने कहा कि यदि किसी महिला को संपत्ति या किसी कीमती वस्तु की गैरकानूनी मांग को पूरा करने के लिए प्रताड़ित किया जाता है, तो वह भी क्रूरता की श्रेणी में आता है और धारा 498A के तहत दंडनीय है. हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की एकल पीठ ने यह टिप्पणी शिकायतकर्ता-पत्नी द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए की. हाईकोर्ट ने सिविल कोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें पति और उसके परिजनों को बरी कर दिया गया था. इसके साथ ही हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपियों को दी गई सजा के फैसले को बहाल कर दिया है.
क्या है पूरा मामला?
यह मामला घाटशिला का है. प्राथमिकी के मुताबिक जून 2008 में पीड़िता का विवाह हुआ था. शादी के समय नकद एक लाख रुपये, सोने के आभूषण और घरेलू सामान दिए गए थे. पीड़िता का आरोप था कि गर्भवती होने के बाद उसके पति ने अपने चावल के व्यवसाय के लिए राइस हॉलर मशीन खरीदने हेतु उसके पिता से एक लाख रुपये की मांग की. जब पीड़िता ने असमर्थता जताई तो उसके पति और ससुराल वालों ने उसके साथ शारीरिक और मानसिक क्रूरता की.
आरोपियों को धारा 498A और 323 के तहत दोषी ठहराया
केस जब कोर्ट पहुंचा तो ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को धारा 498A और 323 के तहत दोषी ठहराया. हालांकि फरवरी 2017 में जिला एवं अपर सत्र न्यायाधीश-I घाटशिला ने इस आधार पर बरी कर दिया था, कि 1 लाख रुपये की मांग व्यापार के विकास के लिए थी न कि दहेज के लिए. हाईकोर्ट ने अपीलीय अदालत के तर्क को बेहद बेतुका करार देते हुए खारिज कर दिया. अदालत ने अपने आदेश में कहा कि आरोपी पक्ष का ऐसा कोई बचाव नहीं था, कि मांगी गई राशि केवल एक ऋण (लोन) थी, जिसे बाद में लौटाया जाना था. यह एक स्पष्ट गैरकानूनी मांग थी, जिसके लिए महिला को प्रताड़ित किया गया. हाईकोर्ट ने माना कि सत्र न्यायालय का बरी करने का फैसला अवैध और तर्कहीन था. इसलिए ट्रायल कोर्ट की सजा को बरकरार रखा जाता है.

