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हजारीबाग: चौपारण सामुदायिक अस्पताल की बदहाल व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में

Hazaribagh: चौपारण सामुदायिक अस्पताल की बदहाल व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है. लंबे समय तक प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी डॉ....

The largest hospital on the Bihar-Jharkhand border faces an administrative vacuum, and the poor condition of the Chauparan Community Hospital has once again come under scrutiny.

Hazaribagh: चौपारण सामुदायिक अस्पताल की बदहाल व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है. लंबे समय तक प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. डीएन ठाकुर और पूर्व प्रभारी डॉ. फरहाना महफूज के बीच कथित गुटबाजी और प्रशासनिक खींचतान से जूझने के बाद अब अस्पताल पूरी तरह बिना प्रभारी के संचालित हो रहा है. स्वास्थ्य विभाग की यह लापरवाही ऐसे समय सामने आई है, जब चौपारण जैसे संवेदनशील और व्यस्त प्रखंड को मजबूत स्वास्थ्य नेतृत्व की सबसे अधिक आवश्यकता है.

तबादला हुआ, लेकिन नए प्रभारी की नियुक्ति नहीं

31 जुलाई को स्वास्थ्य विभाग ने डॉ. डीएन ठाकुर और डॉ. फरहाना महफूज का स्थानांतरण कर दिया. डॉ. फरहाना महफूज को जिला उपाधीक्षक बनाया गया, जबकि डॉ. डीएन ठाकुर को मलेरिया विभाग में पदस्थापित किया गया. लेकिन दोनों अधिकारियों के जाने के बाद अब तक अस्पताल में नए प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी की नियुक्ति नहीं की गई. इससे अस्पताल का प्रशासनिक ढांचा लगभग नेतृत्वविहीन हो गया है.

सीमावर्ती क्षेत्र के सबसे अहम अस्पताल की अनदेखी

चौपारण केवल हजारीबाग का सबसे बड़ा प्रखंड ही नहीं, बल्कि बिहार-झारखंड सीमा से जुड़ा अत्यंत महत्वपूर्ण इलाका भी है. राष्ट्रीय राजमार्ग से जुड़े होने के कारण यहां प्रतिदिन भारी संख्या में वाहन गुजरते हैं. दनुआ घाटी लगातार सड़क दुर्घटनाओं का हॉटस्पॉट बनी रहती है और दुर्घटनाओं में घायल लोगों के लिए चौपारण सामुदायिक अस्पताल ही सबसे पहला उपचार केंद्र है. ऐसे अस्पताल को बिना प्रभारी छोड़ देना विभागीय संवेदनहीनता पर बड़ा सवाल खड़ा करता है.

पहले डॉक्टरों की कमी, अब नेतृत्व का भी अभाव

अस्पताल पहले से ही विशेषज्ञ और सामान्य चिकित्सकों की कमी से जूझ रहा है. कई विभाग सीमित संसाधनों और कम स्टाफ के सहारे चल रहे हैं. ऐसे में प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी का पद खाली रहने से प्रशासनिक निर्णय, स्वास्थ्य सेवाओं की निगरानी और आपातकालीन प्रबंधन जैसी जिम्मेदारियां प्रभावित होने की आशंका बढ़ गई है.

गुटबाजी का दंश झेल चुके मरीज, अब विभागीय लापरवाही का शिकार

स्थानीय लोगों का कहना है कि पहले अस्पताल के अंदर की गुटबाजी और प्रशासनिक विवादों का खामियाजा मरीजों को भुगतना पड़ा. अब जब दोनों अधिकारियों का तबादला हो चुका है, तब भी व्यवस्था पटरी पर नहीं लौट सकी. लोगों का आरोप है कि स्वास्थ्य विभाग ने चौपारण जैसे महत्वपूर्ण अस्पताल को भगवान भरोसे छोड़ दिया है.

डीएन ठाकुर की वापसी की चर्चा ने बढ़ाई हलचल

क्षेत्र में यह चर्चा भी तेज है कि डॉ. डीएन ठाकुर की दोबारा चौपारण में पदस्थापना हो सकती है. हालांकि इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इस संभावना ने नई बहस छेड़ दी है. कई स्थानीय लोगों और जनप्रतिनिधियों का मानना है कि उनका पिछला कार्यकाल लगातार विवादों में रहा था, इसलिए अस्पताल को फिर उसी दौर में ले जाना उचित नहीं होगा. लोगों की मांग है कि नए प्रभारी के रूप में ऐसे अधिकारी की नियुक्ति की जाए, जो प्रशासनिक दक्षता के साथ पूरे चिकित्सा दल को एकजुट कर बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं सुनिश्चित कर सके.

स्वास्थ्य विभाग के सामने कई बड़े सवाल

अब सबसे बड़ा सवाल स्वास्थ्य विभाग से है कि जब चौपारण पहले से चिकित्सकों की कमी से जूझ रहा था, तब दोनों अधिकारियों के स्थानांतरण के बाद तत्काल नए प्रभारी की नियुक्ति क्यों नहीं की गई? क्या विभाग ने सीमावर्ती क्षेत्र और दनुआ घाटी जैसे दुर्घटना प्रभावित इलाके की जरूरतों का आकलन नहीं किया? आखिर अस्पताल का प्रशासनिक संचालन किसके भरोसे चल रहा है?

जनता की मांग-अब प्रयोग नहीं, स्थायी समाधान चाहिए

चौपारण की जनता चाहती है कि अस्पताल को गुटबाजी और प्रशासनिक अस्थिरता से बाहर निकालकर स्थायी व्यवस्था दी जाए. लोगों की मांग है कि बिना विलंब स्थायी प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी की नियुक्ति हो, चिकित्सकों की कमी दूर की जाए और अस्पताल की स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए ठोस एवं प्रभावी कदम उठाए जाएं. क्योंकि स्वास्थ्य व्यवस्था पर होने वाला हर प्रयोग अंततः मरीजों की जिंदगी पर भारी पड़ता है.

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