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असम के चाय बागानों में हेमंत सोरेन की हुंकार, वोट बैंक से हक और सम्मान की ओर बढ़ा आदिवासी समाज

Ranchi: असम विधानसभा चुनाव के प्रचार अभियान में झारखंड मुक्ति मोर्चा के स्टार प्रचारक और झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपनी...

Ranchi: असम विधानसभा चुनाव के प्रचार अभियान में झारखंड मुक्ति मोर्चा के स्टार प्रचारक और झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है. तिनसुकिया जिले के मार्गेरिटा और डिगबोई के चाय बागानों में उमड़े जनसैलाब ने न केवल स्थानीय समीकरणों को चुनौती दी है, बल्कि राज्य की सत्तासीन पार्टियों की बेचैनी भी बढ़ा दी है. मुख्यमंत्री ने स्पष्ट संदेश दिया है कि सालों से जिन्हें केवल वोट बैंक समझा गया, अब वह समाज अपने अस्तित्व, सम्मान और एसटी दर्जे के लिए जाग चुका है. हेमंत सोरेन का चाय बागान में रुकना एक बड़ा मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है. इससे उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की है कि वह और उनकी पार्टी बागान श्रमिकों के सुख-दुख के साथी हैं. डिगबोई के बोगापानी टी स्टेट की जनसभा में उन्होंने भावुक अपील करते हुए कहा, “सालों तक आपको अंधेरे में रखा गया, लेकिन अब चाय बागान का समाज जाग चुका है.”

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मार्गेरिटा से जर्नेल मिंज के पक्ष में ललकार

मार्गेरिटा टी इस्टेट खेल मैदान में आयोजित जनसभा में हेमंत सोरेन ने झामुमो प्रत्याशी जर्नेल मिंज के पक्ष में वोट की अपील की. उन्होंने कहा कि बागान श्रमिकों का यह भारी समर्थन इस बात का प्रतीक है कि अब परिवर्तन की लहर को रोका नहीं जा सकता. हेमंत सोरेन का मार्गेरिटा में रोड शो और बोगापानी टी स्टेट में रात्रि प्रवासकरना यह दर्शाता है कि वह केवल चुनावी भाषण तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सीधे तौर पर श्रमिकों की जीवनशैली और उनकी समस्याओं से जुड़ रहे हैं.

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सियासी पिच पर एसटी दर्जा सबसे बड़ा हथियार

सीएम हेमंत सोरेन ने असम के चाय बागान श्रमिकों जो मूलतः झारखंड और पड़ोसी राज्यों के आदिवासी हैं, की दुखती रग पर हाथ रखा है. सोरेन ने तंज कसते हुए कहा कि उनके असम पहुंचते ही विरोधियों के पसीने छूटने लगे हैं, जिसके कारण अब बड़े-बड़े नेताओं को जमीन पर उतरना पड़ रहा है. अब जब यह समाज अपने हक़ और संवैधानिक सम्मान की मांग कर रहा है, तो सत्ता के गलियारों में खलबली मच गई है. दशकों से इन श्रमिकों का इस्तेमाल सिर्फ चुनाव जीतने के लिए किया गया.

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