झारखंड कांग्रेस में कप्तानी पर कलह: भगत के बाउंसर से पस्त प्रदेश नेतृत्व, संशोधन की सियासत या वजूद की जंग

Ravi Bharti Ranchi: झारखंड कांग्रेस में इन दिनों ऑल इज वेल के नारों के बीच ऐसा क्लाइमेक्स चल रहा है, जिसे देखकर...

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Ranchi: झारखंड कांग्रेस में इन दिनों ऑल इज वेल के नारों के बीच ऐसा क्लाइमेक्स चल रहा है, जिसे देखकर बॉलीवुड की थ्रिलर फिल्में भी शरमा जाएं. 3 मई को घोषित हुई नई प्रदेश कमेटी क्या आई, मानो पार्टी के भीतर असंतोष का पेंडोरा बॉक्स खुल गया. मंत्री राधाकृष्ण किशोर के सुर अभी थमे भी नहीं थे कि लोहरदगा से कांग्रेस सांसद और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुखदेव भगत ने अपनी ही पार्टी के कैप्टन  केशव महतो कमलेश के खिलाफ ऐसा बाउंसर मारा है, जिसने प्रदेश नेतृत्व की फील्डिंग खराब कर दी है.

वॉट्सऐप वाला नेतृत्व 

सुखदेव भगत का हमला सीधा और तीखा है. उनका कहना है कि आज की कांग्रेस जमीन पर पसीना बहाने के बजाय वॉट्सऐप संवाद की खेती कर रही है. उनका सबसे बड़ा प्रहार नेतृत्व की कार्यशैली पर था. भगत ने साफ कहा कि जब टीम संकट में हो, तो कप्तान को शुतुरमुर्ग की तरह रेत में सिर छिपाकर नहीं बैठना चाहिए. राजनीति में शुतुरमुर्ग का संदर्भ देना यह बताने के लिए काफी है कि प्रदेश अध्यक्ष चुनौतियों का सामना करने के बजाय उनसे आंखें चुरा रहे हैं.

आदिवासी कार्ड और परिसीमन का पेंच

झारखंड की राजनीति में आदिवासी शब्द सत्ता की चाबी है, और सुखदेव भगत ने इसी चाबी को घुमा दिया है. उन्होंने आरोप लगाया कि जिस प्रदेश में आदिवासी सीटें घट रही हैं, वहां की परिसीमन कमेटी से डॉ रामेश्वर उरांव, प्रदीप बालमुचू और बंधु तिर्की जैसे दिग्गजों को ऐसे बाहर रखा गया जैसे वे राजनीति के रिटायर्ड हर्ट खिलाड़ी हों.

प्रदेश उपाध्यक्ष ने की डैमेज कंट्रोल की कोशिश

इस पर प्रदेश उपाध्यक्ष सतीश पॉल मुंजनी ने डैमेज कंट्रोल की कोशिश की. उन्होंने संशोधित सूची का हवाला देते हुए राजेश कच्छप और सुरेश बैठा के नामों की ढाल आगे कर दी. लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या यह संशोधन रणनीति थी या सुखदेव भगत जैसे नेताओं के दबाव में किया गया सुधार ? राजनीति में भूल और सुधार के बीच की लकीर बहुत धुंधली होती है.

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पार्टी दफ्तर या प्लेसमेंट एजेंसी

सुखदेव भगत का सबसे गंभीर और सनसनीखेज आरोप पेड स्टाफ को लेकर है. उन्होंने दावा किया कि पीसीसी में उन लोगों को पदाधिकारी बना दिया गया है जो पार्टी के वेतनभोगी कर्मचारी हैं. यह कांग्रेस की उस कार्यकर्ता संस्कृति  पर सीधा तंज है, जहां वर्षों तक झंडा ढोने वाले कार्यकर्ता को दरकिनार कर पसंदीदा चेहरों को रेवड़ियां बांटी गईं. जब पार्टी कार्यालय में उन लोगों के जन्मदिन मनने लगें जिनका कांग्रेस की विचारधारा से कोई वास्ता न हो, तो समझ लेना चाहिए कि संगठन के भीतर विचार नहीं, बल्कि व्यक्ति प्रधान हो गया है.

आंकड़ों का खेल बनाम जमीन का सच

सुखदेव भगत का यह बयान कि मैं उस चींटी को महत्व दूंगा जो काम करती है, न कि उस शेर को जो सोया रहता है,सीधा-सीधा दिल्ली दरबार तक एक संदेश है.महिलाओं और युवाओं की अनदेखी करना चुनाव के मुहाने पर खड़ी पार्टी के लिए आत्मघाती कदम हो सकता है. तीन सचिवों (प्रशांत किशोर, जगदीश साहू, सुरेंद्र सिंह) का इस्तीफा महज इत्तेफाक नहीं, बल्कि गहरी नाराजगी का प्रमाण है.यह लड़ाई सिर्फ कमेटी की नहीं, बल्कि आने वाले विधानसभा चुनाव में टिकटों के बंटवारे और संगठन पर कब्जे की है.

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