Ranchi: झारखंड के जंगलों और उनमें विचरण करने वाले गजराजों सहित तमाम वन्यजीवों के सुरक्षित सफर के लिए सूबे के वन विभाग ने एक बेहद संवेदनशील और वैज्ञानिक पहल की शुरुआत कर दी है. राज्य में लगातार गहराते मानव-वन्यजीव संघर्ष पर लगाम लगाने और बेजुबानों को उनके पारंपरिक रास्तों पर बिना किसी इंसानी दखल के चलने की आजादी देने के लिए सरकार अब देश की बेहतरीन तकनीकी ताकतों को एक मंच पर लाने जा रही है. इस ऐतिहासिक मुहिम के तहत वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग की बेहद महत्वपूर्ण इकाई कैम्पा (CAMPA) ने झारखंड में वन्यजीव कॉरिडोर संरक्षण की व्यापक कार्ययोजना यानी ‘सैपसीसी’ को जमीनी स्तर पर मजबूती से लागू करने का जिम्मा उठाने के लिए एक राष्ट्रीय स्तर की विशेषज्ञ ‘परामर्शदाता एजेंसी’ की तलाश शुरू कर दी है.
कैम्पा की अगुवाई में शुरू हुई प्रक्रिया, अगस्त के पहले हफ्ते में पूरी होगी चयन की रेस
यह पूरी कवायद कैम्पा झारखंड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सह अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक के नेतृत्व में की जा रही है, जिसका असली मकसद कागजी फाइलों में सिमटी संरक्षण योजनाओं को आधुनिक तकनीक के सहारे मैदानी हकीकत में बदलना है. नियुक्त होने वाली विशेषज्ञ एजेंसी सीधे वन विभाग के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करेगी और कॉरिडोर मैपिंग से लेकर हाथियों के सुरक्षित आवागमन की हर छोटी-बड़ी तकनीकी बाधा को दूर करने में मददगार साबित होगी.
खनन और सड़कों से टूटे रास्ते जुड़ेंगे दोबारा, जीआईएस तकनीक से रखी जाएगी नजर
भौगोलिक दृष्टिकोण से देखें तो कोयला, लोहा और अन्य खनिजों से समृद्ध झारखंड में बीते कुछ दशकों के दौरान बढ़ी खनन गतिविधियों, फोरलेन सड़कों के संजाल और रेलवे ट्रैकों के बिछने से जंगली जानवरों के पुश्तैनी रास्ते यानी कॉरिडोर बुरी तरह प्रभावित हुए हैं. इसी का नतीजा है कि आए दिन हमारे हाथी और अन्य हिंसक जानवर रास्ता भटककर सीधे रिहायशी बस्तियों में दाखिल हो जाते हैं, जिससे न सिर्फ ग्रामीणों की फसलें और घर तबाह होते हैं बल्कि बेकसूर लोगों और खुद हाथियों को भी अपनी जान गंवानी पड़ती है.
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