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झारखंड HC का फैसला- 24 साल बाद बर्खास्त कांस्टेबल की बहाली का आदेश, बिना मेडिकल साक्ष्य कड़ी सजा गलत

​रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने पुलिस विभाग के एक पुराने मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए शराब पीकर हंगामा करने के आरोप में...

​रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने पुलिस विभाग के एक पुराने मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए शराब पीकर हंगामा करने के आरोप में दो दशक पहले बर्खास्त किए गए कांस्टेबल गोपाल राम को बड़ी राहत दी है.  जस्टिस दीपक रोशन की एकल पीठ ने गोपाल राम की बर्खास्तगी के आदेश को निरस्त करते हुए उन्हें तत्काल सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया है. 

कब और कहां की घटना?

यह मामला वर्ष 1997 का है जब गोपाल राम धनबाद के गोविंदपुर थाने में तैनात थे. उन पर आरोप लगा था कि उन्होंने ड्यूटी के दौरान नशे की हालत में हंगामा किया और अभद्र व्यवहार किया. इस विभागीय जांच के आधार पर साल 2000 में उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था. जिसके बाद पिछले 24 वर्षों से गोपाल राम इस कानूनी लड़ाई को लड़ रहे थे. 

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हाईकोर्ट ने क्या कहा?

सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि कांस्टेबल को दी गई सजा न केवल अत्यधिक थी बल्कि प्रक्रियात्मक रूप से भी त्रुटिपूर्ण थी. अदालत ने कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि कांस्टेबल पर शराब पीने का आरोप तो लगाया गया लेकिन इसकी पुष्टि के लिए कोई मेडिकल जांच नहीं कराई गई थी. बिना वैज्ञानिक साक्ष्य के केवल मौखिक आरोपों पर इतनी बड़ी कार्रवाई नहीं की जा सकती. 

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कोर्ट का आदेश

हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस दीपक रोशन की पीठ ने कहा कि सेवा से बर्खास्तगी सबसे कठोर दंड है. किसी कर्मचारी की आजीविका छीनने से पहले ठोस साक्ष्य का होना अनिवार्य है. इस मामले में सजा और आरोप के बीच कोई तार्किक संतुलन नहीं दिखा. कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि गोपाल राम को सेवा में बहाल किया जाए. हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि विभाग जरूरी समझे तो वह कानून के दायरे में रहकर सजा की मात्रा पर पुनर्विचार कर नया आदेश पारित कर सकता है लेकिन बर्खास्तगी जैसा कठोर कदम बिना सबूत के मान्य नहीं होगा.

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