झारखंड राज्यसभा रण : 21 पर अटकी भाजपा, आजसू ने कहा – पहले खुद करें मंथन, फिर होगी बात, बड़े भाई की साख दांव पर

Ranchi : झारखंड की सियासत में राज्यसभा की दो सीटों के लिए होने वाला जंग बेहद दिलचस्प मोड़ पर पहुंच गया है....

Ranchi :  झारखंड की सियासत में राज्यसभा की दो सीटों के लिए होने वाला जंग बेहद दिलचस्प मोड़ पर पहुंच गया है. झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के दिग्गज नेता शिबू सोरेन के निधन से खाली हुई एक सीट और भाजपा कोटे के सांसद दीपक प्रकाश का कार्यकाल 21 जून को समाप्त होने के बाद खाली हो रही दूसरी सीट ने राज्य का सियासी तापमान सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है. चुनावी तारीखों के एलान के साथ ही एनडीए खेमे के भीतर ही नंबर गेम की अंदरूनी लड़ाई सतह पर आ गई है. जिसमें सहयोगी दल आजसू ने फ्रंटफुट पर आकर सीधे बड़े भाई भाजपा की घेराबंदी शुरू कर दी है.

आजसू का सीधा वार, पहले खुद संभलो, फिर हमसे बात करो

इस चुनावी बिसात पर सबसे तीखा और नया राजनीतिक एंगल आजसू ने सेट किया है. पार्टी के प्रवक्ता देवशरण भगत ने साफ और कड़े शब्दों में भाजपा को आईना दिखाते हुए कहा है कि एनडीए में भाजपा सबसे बड़ा दल है. इसलिए पहले उसे खुद अपने उम्मीदवार उतारने और अपनी रणनीति पर मंथन करना चाहिए. आजसू का यह बयान एक तरफ जहां सहयोगी धर्म की याद दिलाता है, वहीं दूसरी तरफ भाजपा की कमजोर नस पर दबाव बनाने की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा भी है.

एनडीए के पास 4 वोटों का शॉर्टकट गायब

झारखंड विधानसभा की वर्तमान गणित को देखें, तो राज्यसभा की एक सीट फतह करने के लिए जादुई आंकड़ा 28 वोटों (प्रथम वरीयता मत) का है. यहीं आकर भाजपा की गाड़ी पूरी तरह फंसती दिख रही है. भाजपा के 21 विधायक हैं. वहीं सहयोगी दल आजसू के पास एक, लोजपा के पास एक और जदयू के पास एक विधायक हैं. इस तरह कुल 24 की संख्या हैं. सारे सहयोगियों को मिला लेने के बाद भी एनडीए 28 के जादुई आंकड़े से चार वोट दूर है. इसके विपरीत, सत्ताधारी इंडिया गठबंधन (झामुमो, कांग्रेस, राजद और वाम दल) 56 विधायकों के भारी भरकम संख्याबल के साथ दोनों सीटों पर जीत का दावा ठोक रहा है.

आजसू ने भाजपा के पाले में डाला गंद

आजसू का मानना है कि बिना 4 विधायकों का जुगाड़ किए भाजपा अगर उम्मीदवार उतारती है, तो हार का ठीकरा उस पर फूटेगा, और अगर कदम पीछे खींचती है तो राजनीतिक साख दांव पर लगेगी. आजसू बखूबी जानती है कि भाजपा के 21 विधायकों के बूते अकेले जीतना नामुमकिन है और उसे एक-एक वोट के लिए सहयोगियों के आगे हाथ फैलाना पड़ेगा. ऐसे में पार्टी प्रवक्ता देवशरण भगत के बयान के सियासी मायने भी हैं. आजसू ने स्पष्ट कर दिया है कि भाजपा अपनी अधूरी तैयारी का बोझ सहयोगियों पर न डाले.

 

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