Saurav Singh

Ranchi : झारखंड में दशकों तक आतंक का पर्याय रहे प्रतिबंधित नक्सली संगठन भाकपा (माओवादी) के साथ साथ उससे टूटकर बने अन्य उग्रवादी संगठन अब अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रहे हैं. पुलिस की लगातार कार्रवाई, अंदरूनी कलह और शीर्ष नेतृत्व के सफाये के कारण तृतीय प्रस्तुति कमेटी (टीपीसी) और झारखंड जनमुक्ति परिषद (जेजेएमपी) जैसे संगठन अब पूरी तरह खात्मे की कगार पर पहुंच गए हैं. सुरक्षाबलों के बढ़ते दबाव के बीच इन संगठनों के बड़े चेहरों ने आत्मसमर्पण कर दिया है. वहीं, कुछ या तो गिरफ्तार हो चुके हैं या फिर मुठभेड़ में मारे गए. दूसरी ओर बचे हुए कमांडर अपनी जान बचाने के लिए भूमिगत हो चुके हैं.
दम तोड़ रहा है TPC, सुप्रीमो ब्रजेश गंझू भूमिगत, बचा है सिर्फ एक इनामी
साल 2002 में भाकपा माओवादी से अलग होकर वजूद में आया टीपीसी आज अपने अस्तित्व की आखिरी लड़ाई लड़ रहा है. वर्तमान में हालात यह हैं कि संगठन का सर्वेसर्वा और 25 लाख रुपये का इनामी उग्रवादी ब्रजेश गंझू पूरी तरह से भूमिगत हो चुका है. कभी चतरा, लातेहार और पलामू समेत 9 जिलों में समानांतर सरकार चलाने का दावा करने वाले इस संगठन में अब मात्र एक इनामी उग्रवादी आरिफ बचा है. जिस पर 10 लाख रुपये का इनाम घोषित है.
कैसे और क्यों हुआ था TPC का जन्म
साल 2002 में माओवादियों के सबसे बड़े संगठन एमसीसी (तत्कालीन माओइस्ट कम्युनिस्ट सेंटर) में दो बड़ी वजहों से फूट पड़ी थी. पहला मुख्यधारा के माओवादियों के साथ वैचारिक मतभेद और दूसरा सीपीआई माओवादी में यादव जाति का खासा वर्चस्व था, जिससे अन्य पिछड़ी और शोषित जातियां खुद को उपेक्षित महसूस कर रही थीं.
इसी नाराजगी के चलते कमांडर ब्रजेश गंजू ने बगावत की और टीपीसी की नींव रखी. इस संगठन में मुख्य रूप से भोक्ता, तूरी, बदई, उरांव और गंझु जैसी दलित और आदिवासी जातियों के लोग शामिल हुए. साल 2007 तक महज 70 सदस्यों वाला यह संगठन देखते ही देखते सैकड़ों की संख्या में फैल गया और इसने जोनल, सब-जोनल और जिला कमांडरों का एक मजबूत ढांचा तैयार कर लिया.
माओवादियों को ही माना दुश्मन नंबर वन
टीपीसी की रणनीति शुरू से ही अलग रही. संगठन का मानना था कि उसका दुश्मन नंबर एक सीपीआई माओवादी है. जबकि सुरक्षाबल उसके लिए दूसरे नंबर के दुश्मन हैं. इसी वजह से माओवादी हमेशा आरोप लगाते रहे कि टीपीसी को सुरक्षाबलों का मूक समर्थन हासिल है और यह छत्तीसगढ़ के सलवा जुडुम की तर्ज पर काम कर रहा है. वर्चस्व की इस जंग में दोनों ओर से भारी खून-खराबा हुआ. माओवादियों से अलग होने के बाद टीपीसी के जोनल कमांडर बादल उर्फ राजेश की हत्या हुई. जिसके बाद जेपीसी (झारखंड प्रस्तुति कमेटी) और टीपीसी के बीच जंग छिड़ गई. इससे पहले जेपीसी सुप्रीमो कलजीत गंझू, शाहपुर के मुखिया तापेश्वर साव (2013), जमुना साव (2007) और रेलवे मुंशी इंदीवार मिश्रा (2010) की हत्याओं ने इलाके में खूनी खेल को चरम पर पहुंचा दिया था.
JJMP में अब एक भी इनामी उग्रवादी नहीं : पप्पू लोहरा के मारे जाने के बाद बिखर गया संगठन
माओवादियों से ही टूटकर बना एक और कुख्यात संगठन झारखंड जनमुक्ति परिषद ( JJMP ) भी अब नेतृत्व विहीन और पूरी तरह निष्क्रिय होने की स्थिति में पहुंच गया है. वर्तमान में इस संगठन में एक भी इनामी उग्रवादी शेष नहीं बचा है.
संजय यादव ने रखी थी नींव, पप्पू लोहरा की मौत के बाद बिखराव
माओवादियों के जोनल कमांडर संजय यादव ने करीब 100 दस्ते के सदस्यों के साथ मिलकर साल 2008 में जेजेएमपी का गठन किया था. उग्रवादी गतिविधियों को देखते हुए साल 2009 में झारखंड सरकार ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया था. साल 2010-11 में संजय यादव की मौत के बाद उपेंद्र अंशु सहित कई अन्य कमांडरों ने जेजेएमपी की कमान संभाली. साल 2016-17 में पप्पू लोहरा जेजेएमपी का सुप्रीमो बना और लगभग एक दशक तक संगठन को चलाता रहा. लातेहार में सुप्रीमो पप्पू लोहरा के मारे जाने के बाद संगठन ताश के पत्तों की तरह बिखर गया. इसके बाद कई बड़े इनामी उग्रवादियों ने पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया और बाकी बचे हुए उग्रवादी सलाखों के पीछे भेज दिए गए.
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