मुठभेड़ में मारा गया 15 लाख का इनामी नक्सली कमांडर सहदेव महतो, उसके दो भाई भी हुए थे पुलिस की गोली का शिकार

Ranchi: हजारीबाग जिला के केरेडारी के बटुका जंगल में शुक्रवार को पुलिस और सुरक्षाबलों ने एक बड़ी सफलता हासिल की थी. भीषण...

Ranchi: हजारीबाग जिला के केरेडारी के बटुका जंगल में शुक्रवार को पुलिस और सुरक्षाबलों ने एक बड़ी सफलता हासिल की थी. भीषण मुठभेड़ के दौरान प्रतिबंधित माओवादी संगठन के रिजनल कमेटी मेंबर सहदेव महतो उर्फ सुभाष उर्फ अनुज. उसकी पत्नी नताशा और दो अन्य नक्सलियों को मार गिराया गया. सहदेव महतो झारखंड पुलिस के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ था और उस पर 15 लाख रुपये का इनाम घोषित था. सहदेव महतो को पहली बार वर्ष 2008 में गिरफ्तार कर चाईबासा जेल भेजा गया था,हालांकि नौ दिसंबर 2014 को उसने चाईबासा जेल ब्रेक की सनसनीखेज साजिश रची. इस घटना में कैदियों ने सुरक्षाकर्मियों पर हमला कर दिया था. जेल ब्रेक के दौरान 15 कैदी फरार होने में सफल रहे थे, जिनमें सहदेव और जॉनसन उर्फ चन्द्र गंझू प्रमुख थे. इस दौरान पुलिस की जवाबी कार्रवाई में सहदेव का दो सगे भाई (रामविलास तांती और टीपा दास) मारे गए थे, जबकि कई घायल हुए थे.

14 साल की उम्र में थामी थी बंदूक:

मूल रूप से केरेडारी के कुठान गांव का रहने वाला सहदेव महतो मात्र 14 वर्ष की आयु (1998) में नक्सली संगठन से जुड़ा था. शुरुआत में वह संगठन की सांस्कृतिक इकाई कला जत्था का हिस्सा बना, जहां वह क्रांतिकारी गीतों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिए पैठ बनाता था. उसकी सक्रियता को देखते हुए संगठन ने उसे चाईबासा क्षेत्र में भेज दिया था.

महाराष्ट्र की नक्सली से रचाई थी शादी: 

जेल से फरार होने के बाद सहदेव ने संगठन में अपनी पकड़ मजबूत की और रिजनल कमेटी मेंबर के पद तक पहुंचा करीब तीन साल पहले उसने महाराष्ट्र के गढ़चिरौली (थाइपरागढ़) की रहने वाली नताशा से शादी की थी. नताशा खुद संगठन में सबजोनल कमेटी मेंबर थी और उस पर अकेले 17 आपराधिक मामले दर्ज थे.

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परिवार से बना ली थी दूरी:

ग्रामीणों और परिजनों के अनुसार, सहदेव संगठन में जाने के बाद केवल दो बार अपने घर आया था. उसके पिता मती महतो और बड़े भाई कृष्णा का पहले ही निधन हो चुका है. वर्तमान में उसके परिवार में केवल एक भाभी और उनकी दो बेटी हैं. सहदेव ने अपने परिवार की कभी सुध नहीं ली और न ही उनके लिए कोई आर्थिक मदद की. सहदेव महतो केरेडारी, बटुका, निरी और खपिया के जंगलों में शरण लेकर विकास कार्यों में लगी कंपनियों से लेवी वसूलने का काम करता था. वह इतना शातिर था कि लंबे समय से पुलिस की पकड़ से बाहर था. चाईबासा जेल ब्रेक का एक अन्य साथी जॉनसन गंझू फरार होने के तीन महीने बाद ही ग्रामीणों के हाथों मारा गया था, लेकिन सहदेव लगातार अपनी गतिविधियों को अंजाम दे रहा था.

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