Chaibasa: जिले के सारंडा और कोल्हान के जंगलों में दशकों से अपनी समानांतर सत्ता चलाने का दावा करने वाले नक्सलियों की पकड़ अब ढीली पड़ती दिख रही है. ताज़ा मामला गोइलकेरा थाना क्षेत्र के कुमडी क्षेत्र का है. जहां 24-25 अप्रैल की रात ग्रामीणों के एकजुट प्रतिरोध ने हथियारबंद नक्सलियों को भागने पर मजबूर कर दिया.
राशन के लिए पहुंचे थे नक्सली, ग्रामीणों ने संभाला मोर्चा:
जानकारी के अनुसार, रात के अंधेरे में करीब 10 हथियारबंद नक्सली कुमडी स्थित एक राशन दुकान पर पहुंचे. नक्सलियों ने दुकान खुलवाने और जबरन राशन लेने की कोशिश की, लेकिन इलाके में सुरक्षा बलों की बढ़ती दबिश और नक्सलियों के प्रति कम होते रुझान के बीच ग्रामीणों ने इस बार डरने के बजाय लड़ने का फैसला किया. जैसे ही ग्रामीणों को नक्सलियों की मौजूदगी का शक हुआ, पूरा गांव एकजुट हो गया. ग्रामीण अपने पारंपरिक हथियारों लाठी-डंडे और तीर-धनुष के साथ घर से बाहर निकल आए और नक्सलियों को घेरते हुए मोर्चा संभाल लिया. ग्रामीणों के इस कड़े और संगठित विरोध को देख नक्सली सहम गए और घने जंगल का फायदा उठाकर मौके से भाग निकले.
नक्सलियों के जाने के बाद भी ग्रामीणों का आक्रोश कम नहीं हुआ. गांव की सुरक्षा के लिए ग्रामीणों ने सुबह चार बजे तक जागकर पहरा दिया ताकि दोबारा कोई हमला न हो सके.
सप्लाई लाइन टूटी, अब भूख मिटाना भी हुआ मुश्किल:
यह घटना स्पष्ट रूप से संकेत देती है कि सारंडा और कोल्हान के जंगलों में सुरक्षा बलों द्वारा चलाए जा रहे निरंतर अभियानों ने नक्सलियों की सप्लाई लाइन को पूरी तरह काट दिया है. अब उनके पास न तो रसद पहुंच रही है और न ही उन्हें पहले की तरह स्थानीय समर्थन मिल रहा है. भूख से बेहाल नक्सली अब सीधे गांवों में लूटपाट की कोशिश कर रहे हैं, जहां उन्हें कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा है. सारंडा और कोल्हान के घने जंगल एक-दूसरे से सटे हुए हैं, जो वर्षों से नक्सलियों के लिए सुरक्षित कॉरिडोर रहे हैं.
कुमडीह, बहदा, तितलीघाट, होजरदोरी से लेकर मारांगपोंगा, दुबिल और सलाई तक फैले पहाड़ी रास्ते के जरिए नक्सली कोल्हान के गमहरिया, रेला, पराल, सांगाजाटा और बेरोई तक आसानी से आवाजाही करते हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि इस दुर्गम और विशाल इलाके की पूर्ण घेराबंदी के लिए चार हजार से अधिक जवानों की आवश्यकता है, जो रणनीतिक रूप से एक बड़ी चुनौती है.
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रडार पर इनामी नक्सली,मौत के साये में कट रही रातें:
कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद झारखंड पुलिस, सीआरपीएफ और कोबरा बटालियन का संयुक्त अभियान थमा नहीं है। सुरक्षा बलों के बढ़ते दबाव के कारण शीर्ष नक्सली नेता अब अपनी जान बचाने के लिए दर-दर भटक रहे हैं
