News Wave Desk: भारतीय संस्कृति में पूजा के बाद या घर से निकलते समय माथे पर तिलक लगाना सदियों पुरानी परंपरा है. चंदन, कुमकुम, भस्म या हल्दी से लगाया जाने वाला यह तिलक न सिर्फ धार्मिक पहचान है, बल्कि इसके पीछे वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक कारण भी छिपे हैं.

धार्मिक महत्व: देव कृपा और पहचान

धार्मिक दृष्टि से, शास्त्रों के अनुसार माथे के बीच ‘आज्ञा चक्र’ होता है, जिसे तिलक लगाने से जागृत किया जाता है. वैष्णव परंपरा में चंदन का ऊर्ध्वपुंड्र, शैवों में भस्म का त्रिपुंड्र और शक्ति उपासकों में लाल कुमकुम का तिलक अलग-अलग संप्रदायों का प्रतीक है. यह न केवल आस्था, बल्कि व्यक्ति की धार्मिक पहचान भी दर्शाता है.
वैज्ञानिक पक्ष: एक्यूप्रेशर और शीतलता
आधुनिक विज्ञान और आयुर्वेद के अनुसार, भौंहों के बीच का ‘अजना’ बिंदु एक्यूप्रेशर का केंद्र है. यहाँ तिलक लगाने से मन शांत रहता है, दिमाग को ठंडक मिलती है और सिरदर्द में राहत मिलती है. कुमकुम में मौजूद हल्दी एंटीसेप्टिक है, जबकि केसर तिलक एकाग्रता बढ़ाता है.
मनोवैज्ञानिक असर: आत्मविश्वास बढ़ाता है

मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि तिलक लगाने से आत्मविश्वास बढ़ता है और व्यक्ति को अपनी संस्कृति से जुड़ाव का अनुभव होता है. यह शुभ कार्यों से पहले मन को स्थिर करने वाला पॉजिटिव एंकर भी है.
तिलक केवल माथे को सजाने का साधन नहीं, बल्कि तीसरी आंख के जागरण का माध्यम है. अनामिका उंगली से तिलक लगाने पर शांति, मध्यमा से आयु और अंगूठे से शक्ति मिलती है.विशेषज्ञों की सलाह है कि अगली बार तिलक लगाते समय उसके धार्मिक, वैज्ञानिक और भावनात्मक महत्व को भी समझें. यह परंपरा भारतीय संस्कृति में विज्ञान और आस्था का सुंदर संगम है.
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