SAURAV SINGH
Ranchi: झारखंड में पुलिस मुख्यालय से लेकर राज्य के विभिन्न जिलों तक सरेंडर करने के बाद जमानत पर जेल से बाहर आए नक्सलियों की गतिविधियों पर अब स्पेशल इंटेलीजेंस ब्यूरो (एसआइबी) पैनी नजर रखेगा. पुलिस मुख्यालय स्थित स्पेशल ब्रांच के अधीन कार्यरत एसआइबी ने इसके लिए एक विशेष ‘एक्शन प्लान’ तैयार किया है. इस योजना के तहत एसआइबी सरेंडर करने वाले और जमानत पर छूटे नक्सलियों का एक विस्तृत डेटाबेस और रिपोर्ट तैयार कर रहा है. रिपोर्ट पूरी होने के बाद स्थानीय स्तर पर स्पेशल ब्रांच के डीएसपी और जिला पुलिस के सहयोग से इन पूर्व नक्सलियों की हर गतिविधि पर लगातार मॉनिटरिंग की जाएगी.

तीन मुख्य बिंदुओं पर केंद्रित है विस्तृत रिपोर्ट
- जानकारी के अनुसार, नक्सलियों के सत्यापन और निगरानी के लिए तैयार की जा रही यह रिपोर्ट मुख्य रूप से तीन प्रमुख बिंदुओं पर आधारित है.
- सरेंडर करने वाले नक्सली का नाम, स्थायी और वर्तमान पता.
- वे कौन-से मामले हैं, जिनमें संबंधित नक्सली को अदालत से जमानत मिल चुकी है.
- वे मुकदमे जिनमें अभी तक जमानत नहीं मिली है या सुनवाई जारी है.
- इस रिपोर्ट को अंतिम रूप देने के लिए एसआइबी राज्य के सभी जिले के एसएसपी, एसपी और स्थानीय थानों का सहयोग ले रही है.
जाने क्या एक्शन प्लान का मुख्य उद्देश्य
- वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के अनुसार, झारखंड राज्य वर्तमान में लगभग ‘नक्सल मुक्त’ होने की कगार पर है. ऐसे समय में सरेंडर करने वाले या जमानत पर बाहर आए नक्सलियों पर सतत निगरानी बेहद आवश्यक है.इसके मुख्य दो उद्देश्य हैं.
- पुनर्वास और भटकाव रोकना: यह सुनिश्चित करना कि जेल से बाहर निकलने के बाद पूर्व नक्सली दोबारा अपराध या नक्सली गतिविधियों की राह न पकड़ें.
- समस्याओं का समाधान: सरेंडर नीति के तहत उन्हें मिलने वाले लाभों और जीवन-यापन से जुड़ी समस्याओं का त्वरित निराकरण करना.
हजारीबाग ओपन जेल का हाल और पूर्व नक्सलियों की चिंताएं
वर्तमान में हजारीबाग स्थित ओपन जेल में सरेंडर करने वाले 88 नक्सली रह रहे हैं. स्पेशल ब्रांच की टीम समय-समय पर यहां का दौरा कर इन नक्सलियों के संबंध में जानकारी जुटाती है.

हाल ही में सरेंडर कर चुके कुछ प्रमुख पूर्व नक्सलियों ने मुद्दा उठाया था
हाल ही में सरेंडर कर चुके कुछ प्रमुख पूर्व नक्सली दुर्योधन महतो, नवीन उर्फ सर्वजीत यादव और खुदी मुंडा ने न्यायिक प्रक्रिया में देरी और आर्थिक समस्याओं का मुद्दा उठाया था. उनका कहना है कि अदालतों में लंबित मामलों में अनावश्यक विलंब हो रहा है, जिससे केस लड़ने वाले नक्सलियों को उनके पारिश्रमिक और विधिक सहायता का समय पर भुगतान नहीं हो पा रहा है.
आंकड़ों में समझें: सरेंडर की स्थिति किस साल कितने नक्सलियों ने किया सरेंडर
– 2001: 40
– 2002: 37
– 2003: 03
– 2004: 00
– 2005: 00
– 2006: 00
– 2007: 00
– 2008: 00
– 2009: 01
– 2010: 20
– 2011: 12
– 2012: 08
– 2013: 23
– 2014: 10
– 2015: 11
– 2016: 28
– 2017: 38
– 2018: 23
– 2019: 11
– 2020: 11
– 2021: 17
– 2022: 18
– 2023: 33
– 2024: 26
– 2025: 21
– 2026: 48
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