Ranchi : बालू के कारण झारखंड में विकास की गाड़ी बेपटरी हो रही है. इसकी वजह कोई तकनीकी खराबी नहीं, बल्कि सिस्टम की वो सुस्ती है जिसने राज्य को बालू संकट की आग में झोंक दिया है. आज से ठीक 27 दिन बाद नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के आदेशानुसार बालू के उठाव पर पूर्ण प्रतिबंध लग जाएगा. 10 जून से 15 अक्तूबर तक नदियों से बालू का उठाव पूरी तरह से बंद हो जाएगा. अब मानसून आने वाला है. और टेंडर की प्रक्रिया नहीं सुलझ पाई है.
कागजों में दौड़ रहा टेंडर
झारखंड राज्य खनिज विकास निगम (जेएसएमडीसी) से बालू घाटों का नियंत्रण वापस लेकर उपायुक्तों को सौंप तो दिया गया, लेकिन फाइलें रेंग रही हैं. खान निदेशालय के सख्त निर्देशों के बावजूद अब तक राज्य के 444 चिह्नित घाटों में से केवल 298 की नीलामी प्रक्रिया पूरी हो पाई है. बाकी 146 घाट पर अब भी पेंच फंसा हुआ है. सबसे चिंताजनक स्थिति उन घाटों की है जहां नीलामी तो हो गई, लेकिन पर्यावरण मंजूरी (ईसी ) के अभाव में वहां एक छटांक बालू उठाना भी मुमकिन नहीं है.

मांग और आपूर्ति का डेथ ट्रैप
झारखंड में बालू की डिमांड और सप्लाई के बीच का गणित भी हैरान करने वाला है. राज्य को रोजाना करीब 1.5 लाख से 2 लाख घन फीट (सीएफटी) बालू की जरूरत होती है. पीक सीजन (जनवरी से जून) में यह मांग काफी अधिक रहती है. फिलहाल वैध सप्लाई में 60 फीसदी का भारी अंतर है. झारखंड सरकार की फ्लैगशिप योजनाओं में भी बालू की कमी का असर पड़ रहा है.
राज्य में चल रहे हजारों करोड़ के प्रोजेक्ट्स
अबुआ आवास योजना : मुख्यमंत्री की इस महत्वाकांक्षी योजना के तहत बन रहे लाखों गरीबों के घर अब आधे अधूरे ढांचे बनकर रह गए हैं. बालू की आसमान छूती कीमतों ने गरीब के सिर से छत छीन ली है.
नल जल योजना : घर घर पानी पहुंचाने का सपना कंक्रीट के बिना अधूरा है. टंकियों और पाइपलाइनों का काम अधर में लटका है.
इंफ्रास्ट्रक्चर पर चोट : रांची रिंग रोड, निर्माणाधीन फ्लाईओवर, पंचायत भवन और स्कूलों का निर्माण कार्य धीमा हो गया है. कंक्रीटिंग और फिनिशिंग का काम बालू के बिना संभव नहीं है. ठेकेदार हाथ खड़े कर रहे हैं.
रोजगार का महासंकट
प्रत्यक्ष मार : लगभग 50,000 से 70,000 मजदूर सीधे तौर पर घाटों पर काम करते हैं. जिनका रोजगार 10 जून के बाद पूरी तरह खत्म हो जाएगा.
परोक्ष असर : निर्माण क्षेत्र से जुड़े 3 से 4 लाख लोग, जिनमें राजमिस्त्री, हेल्पर, ट्रक-हाइवा के मालिक और ड्राइवर शामिल हैं, जिनके रोजगार पर संकट आ जाएगा.
कीमतों में उछाल
वैध टेंडर न होने और एनजीटी की रोक के डर से बालू की कीमतों में कृत्रिम उछाल लाया जा रहा है. बालू अब सोने के भाव बिक रहा है. इससे न केवल सरकारी राजस्व को चपत लग रही है, बल्कि राज्य की कानून व्यवस्था भी दांव पर है.
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