Hazaribagh: कहते हैं कि किसी भी शहर की तरक्की और उसका मिजाज वहां की मुख्य सड़क को देखकर आंका जाता है, लेकिन आज हजारीबाग की यही मुख्य सड़क विकास की दास्तां नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही की गवाही दे रही है. जब भोर की पहली किरण के साथ पूरा शहर अभी करवट ले रहा होता है, तब हजारीबाग की माताएं और बहनें अपने हाथों में खाली बर्तन और प्लास्टिक के डब्बे थामे घरों से निकल पड़ती हैं. अपने आशियाने से एक से कुछ किलोमीटर की दूरी तय कर, सिर पर पानी का भारी बोझ उठाए और व्यवस्था के खिलाफ मन में गहरा आक्रोश लिए ये महिलाएं उस व्यस्त मार्ग से गुजरने को मजबूर हैं, जहां पलक झपकते ही तेज रफ्तार भारी वाहन गुजरते हैं. यह सिर्फ पानी का संघर्ष नहीं है, बल्कि हर सुबह इन महिलाओं द्वारा अपनी जान जोखिम में डालकर किया जाने वाला एक अंतहीन पैदल मार्च है.
सड़क पर बहता पानी
हजारीबाग में चल रहे इस जल संकट के बीच जो सबसे हैरान और परेशान करने वाली तस्वीर सामने आई है, वह छठ तालाब के समीप की है. इस वीआईपी इलाके के पास मुख्य सड़क के ऐन बीचों-बीच मुख्य पाइपलाइन फटी हुई है, जिससे रोजाना लाखों लीटर शुद्ध पेयजल यूं ही बर्बाद होकर सड़कों पर बह रहा है. इस नजारे को देखकर चौक-चौराहों पर लोग तीखा व्यंग्य कर रहे हैं कि ऐसा मालूम पड़ता है मानो कागजी विकास खुद सड़क का सीना चीरकर धरातल पर गंगा प्रवाहित कर रहा हो. एक तरफ जनता बूंद-बूंद पानी के लिए मोहल्लों में भटक रही है और दूसरी तरफ हजारों गैलन सरकारी पानी सड़क की धूल धोकर प्रशासनिक तंत्र की कार्यशैली का सरेआम मजाक उड़ा रहा है, लेकिन सुध लेने वाला कोई इंजीनियर या अधिकारी मुस्तैद नजर नहीं आता.

वादे और हकीकत
विडंबना देखिए कि सरकारी फाइलों और विभागों की समीक्षा बैठकों में हर एक दहलीज तक पानी का कनेक्शन पहुंच चुका है. नेताओं के चुनावी मंचों और सोशल मीडिया के चमचमाते पोस्टों पर विकास बुलेट ट्रेन की रफ्तार से दौड़ रहा है, लेकिन हजारीबाग की जमीनी हकीकत इन दावों को पूरी तरह खारिज करती है. चुनावी मौसम आते ही तमाम राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि वादों की बड़ी-बड़ी बाल्टियां लेकर जनता के द्वार पहुंचते हैं, मगर जैसे ही मतपेटियां बंद होती हैं, जनता अगले पांच सालों के लिए उसी खाली बाल्टी को लेकर पानी की तलाश में छोड़ दी जाती है. क्षेत्र की एक पीड़ित महिला ने अपना दर्द बयां करते हुए साफ कहा कि नेता सिर्फ वोट के समय चेहरा दिखाते हैं और बड़े-बड़े आश्वासन देकर गायब हो जाते हैं. उनका सीधा सवाल है कि अगर पानी ही नहीं मिलेगा तो चूल्हा कैसे जलेगा, और जब पीने को पानी नहीं होगा तो इंसान जिंदा कैसे रहेगा?
योजनाओं पर सवाल
इस बदहाली ने राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी ‘नीर-वीर योजना’ और केंद्र सरकार की ‘हर घर नल योजना’ की जमीनी हकीकत पर एक बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है. जब योजनाएं हर नागरिक तक शुद्ध पेयजल पहुंचाने की सौ प्रतिशत गारंटी देती हैं, तो फिर हजारीबाग के शहरी और उपनगरीय इलाकों की महिलाएं आज भी सड़कों पर पानी ढोने को क्यों विवश हैं? क्या ये तमाम बड़ी योजनाएं सिर्फ होर्डिंग्स, पोस्टर्स और अखबारों के विज्ञापनों तक ही सीमित रह गई हैं? क्या करोड़ों रुपये की लागत से बिछाई गई ये पाइपलाइनें सिर्फ उद्घाटन की फीता काटने की रस्म तक के लिए थीं? और सबसे बड़ा सवाल यह कि क्या इस लोकतंत्र में आम जनता को सिर्फ वोट देने वाली एक मशीन समझ लिया गया है? आज पूरा हजारीबाग प्यासा है और सत्ता तथा सिस्टम में बैठे जिम्मेदार लोग अपनी विकासात्मक और प्रमोशनल नींद में पूरी तरह मशगूल हैं. अब देखना यह है कि जनता की यह चीख इन कुर्सियों पर बैठे हाकिमों के कानों तक कब पहुंचती है.


