बेरमो: डीवीसी मुख्यालय द्वारा पेंशनरों के आवास को लेकर जारी की गई नई लाइसेंस फीस नीति ने सेवानिवृत्त कर्मचारियों के जीवन में मानो भूचाल ला दिया है. अपने जीवन का स्वर्णिम काल डीवीसी की सेवा में समर्पित करने वाले पेंशनर्स आज प्रबंधन के इस उदासीन और कठोर रवैये से न केवल हैरान हैं, बल्कि खुद को अपमानित भी महसूस कर रहे हैं.

आवास खाली करने को मजबूर हो रहे पेंशनर्स
पेंशनरों का कहना है कि जिस संस्थान को उन्होंने अपने खून-पसीने से सींचा, वही संस्थान आज उनके साथ दोयम दर्जे का व्यवहार कर रहा है. स्थिति इतनी विकट हो गई है कि मंगलवार को डीवीसी के अवकाश प्राप्त अभियंता आनंद प्रकाश मेहता भारी मन से अपना आवास खाली करते नजर आए, जो वर्तमान हालात की गंभीरता को दर्शाता है.
विडंबना यह है कि एक ओर डीवीसी की आवासीय कॉलोनियों में सैकड़ों मकान कामगारों के अभाव में खाली पड़े हैं और रखरखाव के अभाव में जर्जर हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर वहां रह रहे पेंशनरों पर फीस का भारी बोझ डालकर उन्हें बाहर करने की स्थिति बनाई जा रही है. कई खाली आवासों पर अवैध कब्जा है या फिर प्रबंधन उन्हें तोड़ने की तैयारी में है, लेकिन पेंशनरों को किसी प्रकार की रियायत नहीं दी जा रही है.
आवास खाली करने को मजबूर हो रहे पेंशनर्स
पेंशनरों का तर्क है कि यदि प्रबंधन को वास्तव में आवासों की आवश्यकता होती और उन्हें खाली करने का आदेश दिया जाता, तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं होती. लेकिन वर्तमान नीति बुजुर्ग पेंशनरों को मानसिक और आर्थिक रूप से प्रताड़ित करने वाली प्रतीत हो रही है.
आंकड़ों के अनुसार, बोकारो थर्मल जैसी कॉलोनियों में पहले लगभग 200 पेंशनर्स रहते थे. शुरुआत में आवास के बदले पेंशन से 10 गुना राशि काटी जाती थी, जिसे बाद में बढ़ाकर 20 गुना कर दिया गया. इसके बावजूद पेंशनर्स अपनी पुरानी यादों और सामाजिक जुड़ाव के कारण वहीं बने रहे.
2025 तक कई पेंशनर्स छोड़ चुके घर
लेकिन जब यह फीस 40 गुना की गई, तो वर्ष 2025 तक करीब 70–75 पेंशनरों ने मजबूरन अपने घर छोड़ दिए और रांची या बोकारो जैसे शहरों में शिफ्ट हो गए या अपने पुश्तैनी गांव लौट गए. अब 1 अप्रैल से इस फीस को 60 गुना किए जाने के बाद शेष पेंशनरों के सामने भी आवास खाली करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है.
पेंशनरों का कहना है कि यदि उनकी पेंशन का बड़ा हिस्सा मकान किराए में ही कट जाएगा, तो वे दवाइयों, भोजन और अन्य आवश्यक खर्चों का वहन कैसे करेंगे.
हाईकोर्ट में मामला, फैसले पर सवाल
इस पूरे मामले का एक चिंताजनक पक्ष यह भी है कि प्रबंधन आवास के बदले भारी शुल्क तो वसूल रहा है, लेकिन रखरखाव पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है. इन आवासों को अवैध कब्जे की सूची में डालकर सिविल मेंटेनेंस और सब-स्टेशन विभाग को मरम्मत कार्य न करने के निर्देश दिए गए हैं. इसके कारण पेंशनरों को छत टपकने से लेकर बिजली-पानी की समस्याओं तक के लिए खुद खर्च करना पड़ रहा है.
डीवीसी पेंशनर समाज के सचिव राम सेवक पांडेय ने इस निर्णय को तुगलकी फरमान बताया है. उन्होंने कहा कि आवास किराया वृद्धि का मामला फिलहाल रांची हाईकोर्ट में विचाराधीन है. इसके बावजूद न्यायालय के निर्णय से पहले फीस में 60 गुना बढ़ोतरी करना अलोकतांत्रिक और अमानवीय है.पेंशनरों की मांग है कि प्रबंधन इस फैसले पर पुनर्विचार करे और उन्हें सम्मानजनक जीवन जीने का अवसर प्रदान करे.
