जेल से भाग गया था कैदी, सिविल कोर्ट ने वार्डन को दिया दोषी करार, हाईकोर्ट में पलटा फैसला 

विनीत आभा उपाध्याय Ranchi: झारखंड हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए यह स्पष्ट किया है कि जेल मैनुअल के तहत...

Prisoner had escaped from jail

विनीत आभा उपाध्याय 

Ranchi: झारखंड हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए यह स्पष्ट किया है कि जेल मैनुअल के तहत जेल अधिकारियों पर तय की गई जिम्मेदारियां केवल विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई या कर्तव्य में लापरवाही (साबित करने के लिए प्रासंगिक हो सकती हैं लेकिन इनका उपयोग किसी अधिकारी पर आपराधिक आरोप सिद्ध करने के लिए नहीं किया जा सकता. आपराधिक आरोप केवल दंड विधान में दिए गए अपराध के आवश्यक घटकों के आधार पर ही तय किए जाने चाहिए. 

जेल मैनुअल के नियमों से अपराध साबित नहीं किया जा सकता 

यह टिप्पणी हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की एकल पीठ ने लोहरदगा मंडलीय कारागार से एक विचाराधीन कैदी के भागने के मामले में जेल वार्डन बिद्या भूषण शर्मा की दोषसिद्धि को रद्द करते हुए की. यह मामला नवंबर 2005 का है. जब विचाराधीन कैदी उदय नाथ उरांव उर्फ उदय जी को बिरसा मुंडा सेंट्रल जेल रांची से लोहरदगा जेल स्थानांतरित किया गया था. 

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2006 में जेल से फरार हुआ था विचाराधीन कैदी 

20 मई 2006 की शाम गिनती के दौरान कैदी गायब पाया गया. उस समय बिद्या भूषण शर्मा वार्डन के पद पर तैनात थे. लोहरदगा सिविल कोर्ट ट्रायल के दौरान यह माना था कि वार्डन ने साजिश के तहत कैदी को भागने में मदद की और उन्हें 5 साल के कठोर कारावास और 10,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी.इस फैसले को विद्याभूषण ने हाईकोर्ट में चुनौती दी. जिसपर सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि कैदी के भागने का तरीका खुद संदेहास्पद था. जांच अधिकारी के अनुसार कैदी महिला वार्ड या मुख्य गेट दोनों में से किसी भी रास्ते से भाग सकता था.

ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों के बजाय जेल मैनुअल पर दिया जोर 

जांच अधिकारी ने अधिकारियों की आवाजाही दर्ज करने वाले मुख्य रजिस्टरों का निरीक्षण नहीं किया था. इसके अलावा कैदी ने अपने इकबालिया बयान में कहा था कि वह बिना किसी जेल अधिकारी की मदद के महिला वार्ड से खुद भागा था. अदालत ने पाया कि किसी गवाह द्वारा चाबी सौंपे जाने की बात से भी अपीलकर्ता की संलिप्तता सीधे सिद्ध नहीं होती. ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों का सही से मूल्यांकन करने के बजाय केवल जेल मैनुअल के नियमों पर ध्यान केंद्रित किया. तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को अवैध करार  देते हुए सजा को पूरी तरह से रद्द कर दिया. 

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