सरायकेला: ‘रहेइन डाहा’, कृषिजीवी जनजातियों का बीजारोपण परब, परंपरा और प्रकृति से जुड़ा अद्भुत लोकविश्वास

Saraikela: झारखंड एवं पश्चिम बंगाल राज्य में जेठ मास की अत्यंत उमस, प्रचण्ड गर्मी और गर्म हवा के झोंकों से जनजीवन व्याकुल...

Saraikela: झारखंड एवं पश्चिम बंगाल राज्य में जेठ मास की अत्यंत उमस, प्रचण्ड गर्मी और गर्म हवा के झोंकों से जनजीवन व्याकुल हो उठता है. घर-बाहर कहीं चैन नहीं मिलता. ऐसी विकट परिस्थिति में भी परिश्रमी जनजातीय कृषक हार नहीं मानते. प्रकृति से संघर्ष करने की अद्भुत क्षमता रखने वाला जनजाति समाज इसी समय बीजारोपण की तैयारी में जुट जाता है. गर्मी की इसी व्याकुल अवस्था को “रहेइन डाहा” कहा जाता है. रहेइन केवल एक परब नहीं, बल्कि कृषि, लोकविश्वास, प्रकृति और पूर्वज परंपरा से जुड़ी जनजातीय संस्कृति की जीवंत पहचान है. आज आधुनिकता के दौर में भी यह परंपरा पूरी आस्था और विश्वास के साथ निभाई जाती है.

विषैले जीवों से सुरक्षा का लोकविश्वास

रहेइन के अवसर पर घरों को गोबर नुउढ़ा से रेखाबंदी करने की पारंपरिक परिपाटी रही है. इसे टोटके और सुरक्षा दोनों से जोड़कर देखा जाता है. जनजातीय मान्यता है कि इस रेखा को पार कर सांप और विषैले कीड़े-मकोड़े घर में प्रवेश नहीं कर पाते. आज भी यह परंपरा गांवों में जीवित है. इसी दिन “आषाढ़ी फल” खाने का भी रिवाज है, जिसे “रहेइन फल” भी कहा जाता है. लोकविश्वास के अनुसार इसके सेवन से शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और विषैले जीव-जंतुओं का प्रभाव कम होता है. इसी यकीन के साथ वर्ष में एक बार इस फल का सेवन किया जाता है.

देब रहिन से शुरू होता है परब

प्रत्येक वर्ष जेठ महीने की 13 तारीख को कृषिमूलक जनजातीय समुदाय रहेइन मनाता है. इसके एक दिन पहले 12 जेठ को “देब रहिन” के रूप में पूर्वजों को आमंत्रित किया जाता है. रहेइन के बाद सात दिनों तक “रहेइन डाहा” माना जाता है. इस दौरान सूर्य की तपिश और भी प्रखर हो जाती है, फिर भी कृषिजीवी समाज बीजारोपण का कार्य प्रारंभ कर देता है. रहेइन जाग में बीज बोने की इस नेगाचारि को “धान पुनहा” कहा जाता है. धान पुनहा के बाद ही धान के साथ-साथ खीरा, करैली, बरबटी, तिल, गुंजा, मकई आदि फसलों की बोआई शुरू होती है.

धान पुनहा: पूर्वजों की आराधना के साथ बीजारोपण

धान पुनहा के दिन परिवार का मुखिया नया अथवा साफ धोती-गंजी पहनता है. सुरक्षित रखे बिहन धान को नई बाउगी (टअकी) में भरकर धोती और गमछे से ढक माथे पर उठाकर खेत ले जाया जाता है. खेत के किसी एक कोने में बीज बोकर बीजारोपण की शुरुआत की जाती है. बाउगी पर गुड़ी और सिंदूर लगाकर पूर्वजों, गराम, धरम और बसुमाता की आराधना की जाती है ताकि अच्छी फसल प्राप्त हो सके.

रहिन माटी: विषहरण की लोकसंस्कृति

रहेइन की शाम गांव की सीमा से खेत की मिट्टी लाने की प्राचीन परंपरा है. इस मिट्टी को पहले भूतपीढ़ा पर रखा जाता है और अगले दिन धूप-धुना दिखाकर घर के भीतर सुरक्षित रखा जाता है. जनजातीय मान्यता के अनुसार यह “रहिन माटी” विषहरण का कार्य करती है. सांप, बिच्छू या किसी विषैले कीड़े के काटने पर इस मिट्टी का प्राथमिक उपचार के रूप में उपयोग किया जाता है.

रहिन नुउढ़ा: गोबर की लक्ष्मण रेखा

रहेइन के दिन घर की दीवारों पर चारों ओर गोबर नुउढ़ा या हाथ की अंगुलियों से गोबर के चिन्ह लगाए जाते हैं. इसे सुरक्षात्मक रेखाबंधन माना जाता है. मान्यता है कि यह “लक्ष्मण रेखा” की तरह घर की रक्षा करती है. घर की महिलाएं प्रातः शौच क्रिया से निवृत्त होने से पहले रहिन नुउढ़ा देती हैं. मुख्य द्वार के आसपास गोबर से आकृतियां बनाई जाती हैं, जिन्हें पूर्वजों की स्मृति और बाहरी अलौकिक शक्तियों से रक्षा का प्रतीक माना जाता है.

रहिन दअड़ि: बच्चों की सुरक्षा का विश्वास

रहेइन के दिन छोटे बच्चों की कमर में विशेष धागा बांधा जाता है, जिसे “रहिन दअड़ि” कहा जाता है. लोकविश्वास है कि यह धागा धारण करने वाले बच्चों को सांप नहीं काटता और पेट संबंधी कष्ट भी नहीं होते. जंगल और खेतों में खेलने वाले बच्चों की सुरक्षा के लिए यह परंपरा आज भी निभाई जाती है.

संस्कृति, कृषि और आस्था का संगम

रहेइन डाहा जनजातीय समाज की प्रकृति आधारित जीवनशैली, कृषि संस्कृति और लोकविश्वास का अद्भुत उदाहरण है. यह परब केवल खेती की शुरुआत नहीं, बल्कि पूर्वजों, धरती और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की परंपरा भी है. आधुनिक समय में भी यह सांस्कृतिक विरासत जनजातीय समाज की पहचान बनकर जीवित है.

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