Ranchi: झारखंड एकेडमिक काउंसिल (जैक) के नतीजों ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि प्रतिभा किसी सुख-सुविधा की मोहताज नहीं होती. रांची के मधुकम इलाके की एक तंग गली, जहां किराए का एक छोटा सा कमरा सन्नी वर्मा के सपनों का गवाह बना. वहां आज खुशियों का सैलाब उमड़ा है. सन्नी ने 99.60 फीसदी अंक हासिल कर न केवल पूरे राज्य में टॉप किया है, बल्कि उन हजारों युवाओं के लिए मिसाल पेश की है जो अभावों को अपनी कमजोरी मानते हैं.
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दोहरी शिफ्ट में काम करते पिता, सिलाई करती मां
सन्नी की यह जीत केवल उनकी मेहनत नहीं, बल्कि उनके माता-पिता के त्याग की पराकाष्ठा है. मूल रूप से हजारीबाग के रहने वाले सन्नी के पिता, ब्रजेश कुमार वर्मा, रांची के अपर बाजार में एक कपड़े की दुकान में सेल्समैन हैं. परिवार का गुजारा और बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए वे दिन में सेल्समैन की ड्यूटी करते हैं और रातों को गार्ड बनकर जागते हैं. वहीं, सन्नी की मां घर पर कपड़ा सिलाई कर आर्थिक मोर्चे पर पति का हाथ बंटाती हैं.
सीमित संसाधन, असीमित संकल्प
संत अलोइस स्कूल के छात्र सन्नी शुरू से ही मेधावी रहे हैं. स्कूल के शिक्षकों का कहना है कि सन्नी ने कभी अपनी गरीबी का रोना नहीं रोया. जिस कमरे में परिवार रहता है, वहीं एक कोने में बैठकर उन्होंने अपनी तकदीर लिखी. सन्नी कहते हैं, जब भी मुझे थकान होती थी, मैं अपने पिता के हाथों की लकीरें और मां की सिलाई मशीन की आवाज सुनता था. वही मेरी सबसे बड़ी प्रेरणा थी. सन्नी की इस उपलब्धि की चर्चा आज पूरे राज्य में हो रही है. 99.60 फीसदी अंक लाना कोई मामूली बात नहीं है, लेकिन जिस पृष्ठभूमि से वे आते हैं, उसने इस सफलता को ऐतिहासिक बना दिया है.
