Ranchi: झारखंड शिक्षक पात्रता परीक्षा(जेटेट) में भोजपुरी, मगही, मैथिली और अंगिका को क्षेत्रीय भाषा शामिल करने पर सहमति नहीं बन पाई. शुक्रवार को हुई पांच मंत्रियों की हाइ लेवल कमेटी की बैठक में कोई फलाफल नहीं निकला. इसमें पेंच अभी भी पूरी तरह फंसा हुआ है. अब इस भाषाई संग्राम का अंतिम क्लाइमेक्स मुख्यमंत्री के फैसले पर टिक गया है.

मौजूदा परीक्षा पैटर्न पर आपत्ति
शुक्रवार को हुई उच्च स्तरीय समिति की बैठक में प्रतियोगी परीक्षाओं के मौजूदा भाषा पैटर्न पर गंभीर सवाल उठाए गए. समिति के कई सदस्यों ने वर्तमान व्यवस्था के पार्ट-2 नियम पर कड़ी आपत्ति जताई, जिसके तहत अभ्यर्थियों के लिए 15 जनजातीय भाषाओं में से किसी एक का चयन करना अनिवार्य किया गया है.
शिक्षा और कार्मिक विभाग पास नहीं है कोई आंकड़ा
इस बैठक में कमेटी की सदस्य इस बात से काफी गंभीर नजर आए कि कार्मिक और शिक्षा विभाग ने वह आंकड़ा नहीं पेश कर पाया जो पूरी की बैठक में मांगा गया था। पूर्व की बैठक में कमेटी के सदस्यों ने उपरोक्त विभागों से पूछा था, कि वह बताएं कि पूर्व की नियमावली में से हुई परीक्षाओं में किन-किन अभ्यर्थियों ने किन-किन भाषाओं को लेकर परीक्षा दी थी. इसके अलावा आज की बैठक में मंत्री सुदिव्य कुमार ने कमेटी में अनुसूचित जनजाति और अल्पसंख्यक समुदाय के प्रतिनिधित्व शामिल करने का मुद्दा उठा दिया. इससे बैठक में अब उपरोक्त समुदाय के मंत्रियों को जोड़ने का अंतिम फैसला मुख्यमंत्री के पाले में चला गया है.
Read Also: पाकुड़ पुलिस ने की कार्रवाई, आरोपी गिरफ्तार
सदस्यों का तर्क
भौगोलिक हकीकत: गढ़वा, पलामू और चतरा जैसे सीमावर्ती जिलों में नागपुरी या अन्य अधिसूचित जनजातीय भाषाएं बोलने वालों की तादाद न के बराबर है.
बड़ा नुकसान: अगर यही व्यवस्था लागू रही, तो इन जिलों के लाखों स्थानीय अभ्यर्थी बिना किसी गलती के परीक्षा की रेस से सीधे बाहर हो जाएंगे.
पुराना इतिहास और दूसरी राजभाषा का तर्क
बैठक के दौरान भोजपुरी, मगही, मैथिली और अंगिका को जेटेट में शामिल करने के पक्ष में ऐतिहासिक दलीलें दी गईं. सदस्यों ने याद दिलाया कि वर्ष 2012 और 2019 की सरकारी अधिसूचनाओं में भी इन भाषाओं को जगह दी गई थी. इसके अलावा, मैथिली को तो राज्य की दूसरी राजभाषा का दर्जा प्राप्त है और इसे शिक्षा व्यवस्था से भी जोड़ा जा चुका है. ऐसे में इन भाषाओं को अचानक दरकिनार करना तर्कसंगत नहीं है, क्योंकि सीमावर्ती जिलों में लाखों लोगों की रोजी-रोटी और संवाद का जरिया यही भाषाएं हैं.
प्रतिनिधित्व पर सवाल
इस पूरे विवाद में एक नया ट्विस्ट तब आया जब मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू ने समिति के गठन पर ही सवाल उठा दिया. उन्होंने पुरजोर तरीके से मांग की कि भाषा और सांस्कृतिक पहचान से जुड़े इस बेहद संवेदनशील मसले पर गठित समिति में जनजातीय और अल्पसंख्यक मंत्रियों या प्रतिनिधियों का होना अनिवार्य था, ताकि व्यापक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो सके. हालांकि, इस पर उन्हें यह जवाब मिला कि समिति का ढांचा बदलना या इसका विस्तार करना पूरी तरह से मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार है.
कैबिनेट को सौंपी जाएगी रिपोर्ट
वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने बताया कि समिति की कार्यवाही और सभी सदस्यों के सहमति-असहमति के बिंदुओं को संकलित कर लिया गया है. अगले 2 से 3 दिनों के भीतर यह विस्तृत रिपोर्ट मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और कैबिनेट को सौंप दी जाएगी.झारखंड की वास्तविक पहचान तभी सुरक्षित रहेगी जब सभी भाषाओं और समुदायों को यथोचित सम्मान मिले. जनजातीय भाषाओं के साथ-साथ भोजपुरी, मगही, मैथिली और अंगिका को भी हक मिलना चाहिए ताकि झारखंड वाकई एक सुंदर गुलदस्ता बन सके.
अब आगे क्या
अब सबकी निगाहें मुख्यमंत्री सचिवालय पर टिकी हैं. हेमंत सोरेन के सामने एक तरफ अपनी पार्टी (झामुमो) के मूल आदिवासी-मूलवासी एजेंडे को संतुष्ट रखने की चुनौती है, तो दूसरी तरफ गठबंधन सहयोगियों (कांग्रेस-राजद) को साथ लेकर चलने और सीमावर्ती जिलों के लाखों युवाओं की नाराजगी से बचने का दबाव. देखना दिलचस्प होगा कि मुख्यमंत्री का अंतिम फैसला इस भाषाई विवाद की आग को शांत करता है या सूबे की राजनीति में कोई नया समीकरण पैदा करता है.
कांग्रेस-राजद एक तरफ, झामुमो का अलग रुख
सूत्रों की मानें तो इस भाषा विवाद ने झारखंड की सत्ताधारी तिकड़ी के भीतर वैचारिक मतभेदों को उजागर कर दिया है. एक तरफ जहां कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल वोट बैंक और जमीनी हकीकत का हवाला देते हुए भोजपुरी, मगही और अंगिका को क्षेत्रीय भाषाओं की सूची में शामिल करने के पुरजोर पक्ष में हैं, वहीं दूसरी तरफ झारखंड मुक्ति मोर्चा ने बेहद आक्रामक या जल्दबाजी भरा कदम उठाने के बजाय ‘सावधानीपूर्वक विचार’ करने की नीति अपनाई है.
