बड़कागांव के पूर्वी क्षेत्र में सुलगने लगी आंदोलन की चिंगारी: 5 कोल ब्लॉकों के खिलाफ ग्रामीणों की विशाल पदयात्रा, पीएमओ तक पहुंचा ज्ञापन, डीसी को घेरा

Hazaribagh: झारखंड के आदिवासियों और किसानों को ‘विकास’ के नाम पर मिलने वाले ‘विस्थापन’ के दर्द के खिलाफ एक बार फिर हजारीबाग...

Hazaribagh: झारखंड के आदिवासियों और किसानों को ‘विकास’ के नाम पर मिलने वाले ‘विस्थापन’ के दर्द के खिलाफ एक बार फिर हजारीबाग का बड़कागांव प्रखंड सुलग उठा है. बड़कागांव के पूर्वी क्षेत्र में प्रस्तावित विभिन्न कोल ब्लॉक कोयला परियोजनाओं के विरोध में स्थानीय ग्रामीणों का आंदोलन अब लगातार उग्र और तेज होता जा रहा है. क्षेत्र के सैकड़ों प्रभावित ग्रामीणों और किसानों ने एकजुट होकर विशाल पदयात्रा की और जिला मुख्यालय में महाधरना दिया. आंदोलन के समापन पर आक्रोशित ग्रामीणों ने हजारीबाग उपायुक्त (डीसी) के माध्यम से देश के प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) सहित कई केंद्रीय मंत्रियों को एक कड़क मांग पत्र यानी ज्ञापन प्रेषित कर कोल ब्लॉकों के आवंटन को तत्काल प्रभाव से रद्द करने की गुहार लगाई है. ग्रामीणों का साफ कहना है कि कॉर्पोरेट कंपनियों के फायदे के लिए वे अपनी पुश्तैनी जल, जंगल और जमीन का सौदा किसी भी कीमत पर नहीं होने देंगे.

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पांच बड़ी कोयला परियोजनाओं के खिलाफ एकजुट हुए बड़कागांव के ग्रामीण

ग्रामीणों द्वारा देश के नीति-नियंताओं को सौंपे गए ज्ञापन के अनुसार, यह विरोध मुख्य रूप से गोन्दलपुरा, बादम, मोइत्रा, बाबूपारा एवं रोहने कोल ब्लॉक कोयला परियोजनाओं के खिलाफ है. इस आंदोलन की गूंज देश की राजधानी तक पहुंचाने के लिए ज्ञापन की प्रतिलिपियां प्रधानमंत्री कार्यालय के प्रधान सचिव, केंद्रीय कोयला मंत्रालय के संयुक्त सचिव, वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के संयुक्त सचिव, केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय के संयुक्त सचिव और झारखंड सरकार के मुख्य सचिव को भी भेजी गई हैं. ग्रामीणों ने अपने आवेदन में चिंता और आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा है कि इन विनाशकारी कोयला परियोजनाओं के कारण बड़कागांव प्रखंड के पूर्वी क्षेत्र का भूगोल और अस्तित्व पूरी तरह समाप्त होने की कगार पर पहुंच जाएगा. इससे पहले भी पश्चिमी क्षेत्र में संचालित पकरीबरवाडीह कोयला परियोजना के कारण कई हंसते-खेलते गांव पूरी तरह उजड़ चुके हैं, और वहां के मूल निवासी विस्थापन का दंश झेलकर आज गुमनामी के अंधेरे में अपनी पहचान खो चुके हैं.

सूख जाएगी जीवनदायिनी ‘बदमाही नदी’, खड़ा होगा भयानक खाद्यान्न संकट

आंदोलनकारियों ने इन परियोजनाओं से होने वाले पर्यावरणीय विनाश का पूरा खाका खींचते हुए कहा कि कर्णपुरा उत्तरी एवं दक्षिणी क्षेत्र में चल रही अन्य खनन परियोजनाओं के घातक दुष्परिणाम आज सबके सामने है. बड़कागांव के पूर्वी क्षेत्र के दर्जनों गांवों की सिंचाई एवं पेयजल का मुख्य स्रोत ‘बदमाही नदी’ है, जो इन नई परियोजनाओं की भेंट चढ़कर पूरी तरह सूख जाएगी. इसके अलावा, यह पूरा क्षेत्र नदियों और नालों के किनारे बसा है, जहां की मिट्टी बेहद उपजाऊ और बहुफसली है. यहां के किसान बड़े पैमाने पर धान, गन्ना, सब्जी, तिलहन और दलहन की रिकॉर्ड खेती करते हैं. इस कृषि भूमि के नष्ट होने से न केवल इस क्षेत्र में, बल्कि पूरे राज्य में गंभीर खाद्यान्न संकट पैदा हो जाएगा, जिसकी भरपाई कंपनियों द्वारा दी जाने वाली मुआवजे की किसी भी राशि से संभव नहीं है.

जंगल काटकर बगीचे लगाना पर्यावरण का विकल्प नहीं, कंपनियों पर फर्जीवाड़े का आरोप

आंदोलन के मंच से वक्ताओं ने कहा कि इन परियोजनाओं के कारण हजारों हेक्टेयर सघन वन भूमि नष्ट होगी और लाखों पेड़ बेरहमी से काटे जाएंगे. बड़े वन क्षेत्र को नष्ट कर कागजों पर छोटे-छोटे बगीचे लगाना पर्यावरण संरक्षण का विकल्प नहीं हो सकता, जैसा कि गोन्दलपुरा कोल परियोजना में अडानी कंपनी द्वारा किया जा रहा है. इसके अतिरिक्त, यह क्षेत्र हाथियों का प्राकृतिक कॉरिडोर भी है, जिससे मानव-हाथी द्वंद्व बढ़ेगा और वन्यजीवों पर गंभीर संकट खड़ा होगा. ज्ञापन में स्थानीय प्रशासन और कंपनियों की कार्यशैली पर भी फर्जीवाड़े का संगीन आरोप लगाया गया है. ग्रामीणों का कहना है कि कंपनियां बाहरी और फर्जी किसानों को खड़ा कर ग्राम सभा एवं जनसुनवाई जैसे लोकतांत्रिक नाटकों का आयोजन कर रही हैं. उदाहरणस्वरूप, अडानी कंपनी द्वारा 20 जनवरी 2026 तथा एनटीपीसी कंपनी द्वारा 10 मई 2026 को एनटीपीसी आईटीआई कॉलेज में आयोजित किए गए कार्यक्रमों को ग्रामीणों ने सिरे से ‘अस्वीकार’ और खारिज कर दिया है. ग्रामीणों की स्पष्ट मांग है कि प्रभावित क्षेत्र में निष्पक्ष रूप से मतपत्र के माध्यम से जनमत संग्रह कराया जाए. यदि 51 प्रतिशत जनता परियोजनाओं के पक्ष में वोट देती है तो ही परियोजनाएं जारी रहें, अन्यथा आवंटन को फौरन रद्द किया जाए.

लाठी और झूठे मुकदमों के दम पर आंदोलन कुचलने का प्रयास, रिहाई की मांग

आंदोलनकारियों ने प्रधानमंत्री से मुख्य रूप से मांग की है कि इन परियोजनाओं के लिए ग्राम सभा प्रस्ताव पारित करने से संबंधित सभी फर्जी पत्रों एवं प्रशासनिक प्रक्रियाओं को तत्काल निरस्त किया जाए. इसके साथ ही खाद्य, जल, प्राणवायु सुरक्षा एवं आर्थिक संतुलन को ध्यान में रखकर उपरोक्त सभी कोल ब्लॉकों का आवंटन तुरंत रद्द हो. ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि कंपनियों के विरोध को दबाने के लिएअ आंदोलनकारी किसानों व ग्रामीणों पर कई झूठे मुकदमे थोपे गए हैं, जिन्हें अविलंब वापस लिया जाए तथा गिरफ्तार साथियों को बिना शर्त रिहा किया जाए. बड़कागांव पुलिस प्रशासन द्वारा कंपनियों के प्रभाव में आकर आंदोलनकारियों के साथ की जा रही मारपीट, गाली-गलौज, धमकी और जमीन देने के अवैध दबाव पर तत्काल रोक लगाई जाए.

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जिले के किसान नेता और स्थानीय प्रतिनिधि उतरे मैदान में

इस विशाल धरना और पदयात्रा में देश के कई प्रमुख सामाजिक और राजनैतिक कार्यकर्ताओं ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई. कार्यक्रम में मुख्य रूप से संयुक्त किसान मोर्चा के महासचिव राजकुमार भारत (हरियाणा), ‘आज आजादी क्यों आंदोलन’ की बिहार प्रदेश संयोजिका शीलम झा और सीपीआई के प्रदेश सचिव महेंद्र पाठक विशेष रूप से उपस्थित थे. इसके साथ ही स्थानीय आंदोलनकारियों और जन प्रतिनिधियों में बालेश्वर महतो, श्रीकांत निराला, यशोदा देवी, विकास कुमार, लोकनाथ महतो, मुखिया इलियास अंसारी, मुनेश्वर महतो, बादम के रवि कुमार दांगी, हरली के अनिरुद्ध कुमार दांगी, गोन्दलपुरा के विनोद महतो, हजारीबाग सदर के प्रदीप प्रसाद और बड़कागांव के रोशन लाल चौधरी आदि ने अपनी सक्रिय भागीदारी दर्ज कराते हुए इस लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाने का संकल्प लिया.

विकास की कीमत पर विनाश कब तक?

बड़कागांव के पूर्वी क्षेत्र से उठी विरोध की यह आवाज कोई नई नहीं है, लेकिन यह इस बात का जिंदा सुबूत है कि ‘विकास’ के नाम पर ‘विस्थापन’ का जो दर्द झारखंड के आदिवासियों और किसानों को मिला है, उसकी टीस अब बर्दाश्त से बाहर हो चुकी है. ग्रामीणों का यह डर पूरी तरह जायज है कि अगर उपजाऊ बहुफसली जमीन, बदमाही नदी जैसी जीवनदायिनी जलस्रोत और पर्यावरण का आधार माने जाने वाले जंगल ही उजाड़ दिए जाएंगे, तो मुआवजे के चंद टुकड़े भविष्य की भूख कैसे मिटा पाएंगे? पकरीबरवाडीह परियोजना का उदाहरण सबके सामने है, जहां के मूल निवासी आज अपनी पहचान खोकर गुमनामी की जिंदगी जीने को मजबूर हैं. ऐसे में गोन्दलपुरा, बादम और रोहने जैसी पांच बड़ी परियोजनाओं को बिना स्थानीय जनभावनाओं के लागू करना जल, जंगल और जमीन पर सीधे हमले जैसा है. कॉर्पोरेट कंपनियों पर ‘फर्जी’ ग्राम सभाएं और लोक सुनवाई आयोजित करने के जो आरोप ग्रामीणों ने लगाए हैं, वे बेहद गंभीर हैं और लोकतंत्र की मूल भावना को आहत करते हैं. अगर देश का किसान और ग्रामीण मतपत्र के जरिए जनमत संग्रह की मांग कर रहा है, तो सरकार और जिला प्रशासन को इस पारदर्शी प्रक्रिया से पीछे नहीं होना चाहिए. लोकतंत्र में लाठी और मुकदमों के दम पर जनता की आवाज को दबाकर किया जाने वाला विकास, कभी भी जन-कल्याणकारी नहीं हो सकता. समय आ गया है कि नीतियां बनाने वाले एयर-कंडीशन कमरों से निकलकर बदमाही नदी के सूखने के खतरे और किसानों के माथे की चिंता को समझें.

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