Saurav Singh

Ranchi: जंतर-मंतर की चकाचौंध भरी सुर्खियों, कैमरों की फ्लैशलाइट्स और राष्ट्रीय स्तर पर गूंजने वाले नारों के मुकाबले रांची की यह भीड़ संख्या के लिहाज से भले ही छोटी और शांत प्रतीत हो. लेकिन इतिहास गवाह है कि क्रांति या विरोध के पैमाने कभी भी सिर्फ भीड़ के आंकड़ों से नहीं नापे जाते. आज रांची का जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम महज एक खेल परिसर नहीं रहा, बल्कि वह एक ऐसा जन-चौराहा बन चुका है जो अनजाने में ही सही, लेकिन बहुत ही गहरे अंदाज में देश की राजधानी के उन ऐतिहासिक आंदोलनों की याद दिलाता है, जिन्होंने सत्ता की नींव हिला दी थी. जंतर-मंतर की ही तर्ज पर यह आंदोलन भी आज जन-आक्रोश, राजनीतिक सहभागिता और मूक जनसमर्थन के एक ऐसे संवेदनशील मोड़ पर खड़ा है, जहां से पीछे लौटने का कोई रास्ता नजर नहीं आता.

राजनीति की छांव और स्वतःस्फूर्त जनता का सैलाब
किसी भी बड़े लोकतांत्रिक आंदोलन की तरह रांची के इस प्रदर्शन में भी राजनीतिक दलों, उनके कार्यकर्ताओं और जाने-माने चेहरों की मौजूदगी से इंकार नहीं किया जा सकता. एक स्पष्ट राजनीतिक अंडर-करंट यहां साफ तौर पर महसूस किया जा रहा है. विपक्षी दलों की सक्रियता, नेताओं के भाषण और कार्यकर्ताओं की गोलबंदी इस बात का प्रमाण है कि सत्ता विरोधी लहर को भुनाने की कोशिशें अपनी जगह पर हैं. मैदान में जुटी भीड़ का एक बहुत बड़ा हिस्सा पूरी तरह से स्वतःस्फूर्त है. यहां मौजूद आम नागरिक किसी राजनीतिक दल के बुलावे पर नहीं आए हैं, उनके भीतर घर कर चुकी व्यवस्थागत लाचारी और भविष्य को लेकर अनिश्चितता उन्हें अपने घरों से खींचकर इस मैदान तक ले आई है.

डेमोग्राफिक्स का सच
अगर हम जंतर-मंतर के आंदोलनों के चरित्र को देखें, तो वह मुख्य रूप से एक युवा भारत का ठिकाना था. वहां जेन जी पीढ़ी, पहली बार सड़कों पर उतरने वाले कॉलेज के छात्र और ऐसे तमाम आदर्शवादी युवा बड़ी संख्या में मौजूद थे, जिन्हें पूरा यकीन था कि उनके थोड़े से प्रयास से ही देश की पूरी व्यवस्था में जादुई बदलाव आ जाएगा. उनके पास सपने थे, उम्मीदें थीं और भविष्य को लेकर एक चकाचौंध भरा विश्वास था. इसके विपरीत, रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम का डेमोग्राफिक प्रोफाइल बिल्कुल जुदा कहानी कहता है. यहां आंदोलन की धुरी पर खड़े लोग 25 से 35 साल की उम्र के वे युवा हैं. संस्थाओं से बार-बार मिले भरोसे के आघात ने इन्हें अंदर से तोड़ दिया है. न्यायपालिका से लेकर कार्यपालिका तक, हर जगह खुद को ठगा हुआ महसूस करने वाला यह वर्ग अपनी जवानी की उस अनमोल कीमत का हिसाब मांग रहा है, जिसे इस भ्रष्ट और ध्वस्त हो चुकी व्यवस्था ने दीमक की तरह चट कर दिया है.
जन-भागीदारी का अनूठा मॉडल
किसी भी आंदोलन की जीवंतता इस बात से तय होती है कि उसे जनता का कितना खुला समर्थन मिल रहा है. इस मोर्चे पर रांची का यह प्रदर्शन जंतर-मंतर के उन ऐतिहासिक दिनों की बिल्कुल सटीक प्रतिलिपि पेश कर रहा है.जैसे दिल्ली में आम नागरिकों, स्थानीय दुकानदारों और दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले लोगों ने प्रदर्शनकारियों की रसद और जरूरतों का जिम्मा उठाया था, वैसी ही तस्वीर आज रांची में भी देखने को मिल रही है.यह परोक्ष समर्थन इस बात की तस्दीक करता है कि गुस्सा सिर्फ मैदान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज की नसों में दौड़ रहा है.
विरोध की भाषा बदली
आंदोलनों के भी अपने व्याकरण और भाषा होती है. कुछ साल पहले तक दिल्ली के जंतर-मंतर पर दिखने वाले विरोध प्रदर्शनों में एक खास तरह की सांस्कृतिक चमक हुआ करती थी. वहां नुक्कड़ नाटक, व्यंग्य कविताएं, गिटार की धुनों पर गाए जाने वाले गाने, चटकीले और चुटीले पोस्टर तथा सत्ता में बैठे हुक्मरानों पर तीखे कटाक्ष मुख्य आकर्षण होते थे. वहां असंतोष के स्वर को भी एक कलात्मक और हल्का-फुल्का जामा पहनाया जाता था.लेकिन झारखंड की आबोहवा में पल रहे इस आंदोलन का मिजाज बिल्कुल अलग और कहीं अधिक गंभीर है. यहां गहरा आक्रोश, घुटन, बेबसी और बेहिसाब दर्द का है.
मैदान बदलेंगे, भावनाएं नहीं
आज रांची का जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम भले ही आकार में छोटा दिखे, लेकिन वह उसी ‘नए जंतर-मंतर’ का झारखंडी संस्करण है. मुद्दे बदल सकते हैं, शिकायतें नई हो सकती हैं, और प्रदर्शन के मैदानों के नाम भी बदल सकते हैं, लेकिन उस पीढ़ी की भावना कभी नहीं बदलेगी जो खुद को ठगा हुआ महसूस करती है.
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