हाईकोर्ट से मुंजाल परिवार को झटका, कहा-आदिवासी खाते की भूमि खरीदने के लिए धोखे से ली अनुमति

Vinit / Saurav / Manjusha Ranchi : झारखंड हाईकोर्ट ने जमीन संबधी दशकों पूराने विवाद पर अपना अहम फैसला सुनाया. मामला रांची...

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Ranchi : झारखंड हाईकोर्ट ने जमीन संबधी दशकों पूराने विवाद पर अपना अहम फैसला सुनाया. मामला रांची के बरियातू रोड के मेडिका अस्पताल के पास स्थित बूटी मौजा की लगभग 2.90 एकड़ की प्राइम लोकेशन वाली जमीन से संबधित है. अदालत ने 1959 में तत्कालीन उपायुक्त द्वारा दी गई जमीन बेचने की अनुमति को शुरू से ही शून्य बताया. साथ ही याचिकाकर्ता मुंजाल परिवार की मांगों को खारिज कर दिया है.

क्या है मामला

यह विवाद बूटी मौजा के खाता संख्या 79, प्लॉट संख्या 1947, 1948 और 1949 से जुड़ा है. हाईकोर्ट में याचिका दायर करने वाले मुंजाल परिवार का कहना था कि उन्होंने यह जमीन 1959 में मिली वैध अनुमति के बाद खरीदी थी. राज्य सरकार और निजी पक्षकारों का तर्क था कि यह जमीन मूल रूप से आदिवासी रैयत बिप्ता पाहन की थी और इसकी खरीद-बिक्री के लिए छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम सीएनटी का उल्लंघन कर धोखे से अनुमति ली गई थी. हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस दीपक रौशन की एकल पीठ ने इस मामले की विस्तृत सुनवाई के बाद पाया कि 1959 में जमीन हस्तांतरण की अनुमति देते समय कानूनी प्रक्रियाओं की अनदेखी की गई.

मूल अनुमति अवैध तो सभी दावें अमान्य

1959 के आदेश में जमीन बेचने का कारण बैल खरीदना बताया गया था. अदालत ने स्पष्ट किया कि सीएनटी एक्ट के तहत यह उचित और पर्याप्त उद्देश्य नहीं माना जा सकता. अपने आदेश में कोर्ट ने दोहराया कि सीएनटी एक्ट का मूल उद्देश्य आदिवासियों की जमीन को गैर आदिवासियों के हाथों में जाने से बचाना है. अगर मूल अनुमति ही अवैध थी तो उस पर आधारित कोई भी दावा मान्य नहीं हो सकता.

याचिकाकर्ता का मुख्य आधार की अवैध
इससे पहले मई 2021 में तत्कालीन मंत्री चंपई सोरेन ने पीठासीन पदाधिकारी के रूप में इस जमीन हस्तांतरण को रद्द करने और खरीदारों पर प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश दिया था. लेकिन कोर्ट ने मुंजाल परिवार को राहत देते हुए 2021 के आदेश के उस हिस्से को रद्द कर दिया. जिसमें एसीबी जांच और आपराधिक केस दर्ज करने की बात कही गई थी. कोर्ट ने माना कि यह आदेश पीठासीन पदाधिकारी के अधिकार क्षेत्र से बाहर था. कोर्ट ने पूरी याचिका को खारिज कर दिया क्योंकि याचिकाकर्ता का मुख्य आधार ही अवैध पाया गया. अदालत ने साफ कर दिया है कि समय बीत जाने का मतलब यह नहीं है कि एक अवैध आदेश वैध हो जाएगा.आदिवासी जमीन की सुरक्षा के लिए कानून का लिबरल नहीं बल्कि उद्देश्यपूर्ण पालन अनिवार्य है.

 

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