Hazaribagh:हजारीबाग के विनोबा भावे विश्वविद्यालय शिक्षा का मंदिर नहीं, बल्कि घोटालों की है ऐसी पाठशाला बन चुका है, जहां आनेवालों को पठन पाठन की बजाय घपला, अनियमितता करके उसे छिपाने का पाठ पढ़ाया जाता है. पिछले कई सालों से हो रहे ऐसे घोटाले के कई राज यहां दफन हैं, जिसपर कार्रवाई तो दूर उसपर ध्यान तक नहीं दिया गया. जबकि शिकायत के बाद विभाग ने ही कमेटी गठित कर जांच रिपोर्ट देने का निर्देश जारी किया और जब जांच रिपोर्ट मिली तो उसपर कुंडली मारकर विभागीय अधिकारी बैठ गए. उसपर खेल हो गया. यह कोई एक मामला के साथ नहीं हुआ, बल्कि सैकड़ों ऐसे मामले और उनसे जुड़े राज, यहां दफन कर दिये गए.
मार्खम कॉलेज को रूसा से मिले 01 करोड़ 20 लाख का किया गया वारा न्यारा का भी एक मामला भी इसमें शामिल है. वैसे तो कई कॉलेज को छात्रों के हित में रूसा से संसाधान मद में लाखों करोड़ों मिले पर खरीद और खर्च में नियम और प्रावधान का कभी ख्याल नहीं रखा गया. जो भी खरीद कहीं भी हुई, आज उन सामानों को खोजा जाए तो कहीं खराब मिलेंगे तो कहीं गायब. मार्खम कॉलेज के अनियमितता का मामला इस कारण सामने आ गया, क्योंकि इस प्रकरण में अधिवक्ता राणा राहुल प्रताप द्वारा खरीद में अनियमितता की लिखित शिकायत की गई थी. शिकायत के आलोक में तत्कालीन कुलपति द्वारा तीन सदस्यीय जांच कमेटी का गठन किया गया था. समिति का संयोजक प्रो. मिथिलेश कुमार सिंह को बनाया गया. जबकि सदस्यों में विनोद जिन और अविनाश कुमार को रखा गया. 06 जून 2025 को कमेटी ने भारी अनियमितता को पकड़ते हुए जो रिपोर्ट दी, उसमें कार्रवाई की जरूरत थी पर उसे दाकर रवी की टोकरी में फेंक दिया गया. बताया गया कि प्रिंसिपल द्वारा सा फडके तहत खरीद के लिए प्रस्तुत किए गए बोली दस्तावेजों (/239-252) के अनुसार अधिकांश वस्तुओं को बिना बांड वाली के रूप में सूचीबद्ध किया गया था. इन वस्तुओं के विस्तृत निर्देश प्रदान नहीं किए गए थे. जांच प्रतिवेदन में बताया गया कि प्रधानाचार्य ने समिति के प्रश्नों संख्या 1 से 6 के संतोषजनक उत्तर नहीं दिए गए. यह भी लिखा गया कि झारखंड सरकार के डीएचटीई से मिले दिशा निर्देश की अनदेखी हुई. जिसमें प्रिंसिपल क्रेता और माल प्राप्तकर्ता के रूप में कार्य करने और कोषाध्यक्ष नामित भुगतान प्राधिकारी होने की बात कही गयी थी. इन भूमिकाओं को सिस्टम में तदनुसार स्थापित किया जाना था और मार्गदर्शक प्रारुप भी प्रदान किया गया था.
जांच समिति ने निष्कर्ष दिया
समिति ने संबंधित दस्तावेजों की गहन जांच के बाद यह राय व्यक्त की है कि झारखंड सरकार के द्वारा निर्धारित और विश्वविद्यालय द्वारा सूचित भूमिकाओं और जिम्मेदारियों से स्पष्ट विवरण था. विशेष रूप से भुगतान प्राधिकारी के पदनाम के संबंध में. विवरण को दरकिनार करते हुए भुगतान प्राधिकारी की भूमिका समन्वयक को हस्तांतरित करना प्रक्रियात्मक मानदंडों के विरुद्ध था. मार्खम कॉलेज ऑफ कॉमर्स, हजारीबाग के प्रिंसिपल ने कोई जवाब नहीं दिया. पूछताछ का संतोषजनक उत्तर नहीं दिया गया. सबसे बड़ी बात इस 50 लाख की खरीदारी में 200 डेस्क- बेंच, 46 स्टील अलमीरा, 20 लेजर प्रिंटर, 10 ओपेन बुक सेल्फ, 05 एसी, 02 मल्टी फोटो कॉपिपर मशीन, 12 बैटरी समेत अन्य सामग्री शामिल है. आज इनकी खोजबीन हो और खरीद की रकम की सही जांच हो तो बड़ा गोलमाल आ जायेगा, पर जांच रिपोर्ट दबा दिया गया और फिर अनियमिता के बावजूद शेष रकम 70 लाख की दूसरी खरीद भी कर ली गई. सवाल यह कि पूछे कौन और जांचे कौन, कॉलेज से विभावि तक सभी है मौन हैं.
छात्रों से अवैध वसूली और विभावि में करोड़ों का घोटाला, हो उच्चस्तरीय जांच: चंदन
विभावि में जेएमएम छात्र नेता चंदन सिंह ने एक बार फिर गंभीर आरोप लगाए है. कहा कि विश्वविद्यालय में वर्षों से चल रही वित्तीय अनियमितताओं और भ्रष्टचार ने अब बड़ा रूप ले लिया है, जिससे हजारों छात्रों का आर्थिक शोषण हो रहा है. आरोप लगाया है कि कोविड 19 के बाद विभावि में जहाँ पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन कर दी गई, वहीं छात्रों से फॉर्म के नाम पर भारी शुल्क वसूला जा रहा है. हर साल लगभग 50,000 छात्रों से करोड़ों रुपये की वसूली की जा रही है. एक और छात्र साइबर कैफे में भुगतान कर रहे हैं, दूसरी ओर विश्वविद्यालय भी शुल्क ले रहा है. यानी साफ तौर पर दोहरी वसूली चल रही है. आरोप लगाया कि विश्वविद्यालय खुद एडमिट कार्ड नहीं दे रहा, छात्र साइबर कैफे से निकालने को मजबूर हैं. कहा फिर भी, एक निजी कंपनी को छपाई के नाम पर भुगतान और छात्रों से अलग वसूली, यह पूरा मामला गंभीर संदेह के घेरे में है. पैसे का की लूट की छूट पूर्ण रूप से विश्वविद्यालय के पदाधिकारियों ने निजी कंपनियोंको दे रखी है. आरोप लगाया कि परीक्षा विभाग में फॉर्म भरने के नाम पर हुए घोटाले में हजारों छात्रों से लाखों रुपये लिए गए, लेकिन यह राशि विश्वविद्यालय के खाते में जमा तक नहीं हुई. उन्होंने मामले को लेकर महालेखाकार, रांची से उच्चस्तरीय जांच की मांग की.
