Ranchi: रांची जिले में जमीन सीमांकन (डिमार्केशन) का काम इन दिनों गंभीर संकट से गुजर रहा है. एक ओर जिले के 22 अंचलों में 876 सीमांकन मामले अब भी लंबित हैं, वहीं दूसरी ओर झारखंड हाईकोर्ट द्वारा निजी जमीन की मापी और सीमांकन पर अंचलाधिकारियों की कार्रवाई पर रोक लगाए जाने के बाद आम लोगों की मुश्किलें और बढ़ गई हैं. इसका सीधा असर जमीन खरीद-बिक्री, रजिस्ट्री, कब्जा स्पष्ट कराने, प्लॉट की सीमा तय कराने और नए खरीदारों की कानूनी सुरक्षा पर पड़ रहा है. रांची जिला प्रशासन की सर्किलवार रिपोर्ट के मुताबिक 1 अप्रैल 2023 से 30 मई 2026 तक जिले में सीमांकन के कुल 10,645 मामले आए. इनमें 3,024 मामलों का निष्पादन/स्वीकृति हुई, 6,298 मामले खारिज किए गए, लेकिन 876 मामले अब भी लंबित हैं. इनमें बड़ी संख्या ऐसे मामलों की है, जो 30, 60 और 90 दिनों से अधिक समय से अटके हुए हैं. रिपोर्ट के अनुसार 374 मामले 90 दिन से अधिक समय से लंबित हैं. ऐसे समय में हाईकोर्ट के आदेश ने लंबित मामलों के समाधान की रफ्तार को और धीमा कर दिया है.
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हाईकोर्ट के आदेश से क्यों थम गया सीमांकन का काम?
झारखंड हाईकोर्ट ने हाल में एक अहम आदेश में कहा कि निजी जमीन के अधिकार, स्वामित्व और सीमा से जुड़े विवादों में अंचलाधिकारी (CO) द्वारा मापी और सीमांकन नहीं किया जाएगा, क्योंकि ऐसे मामलों में अक्सर टाइटल, कब्जा और स्वामित्व का विवाद जुड़ा होता है, जिसका फैसला राजस्व प्रशासन नहीं बल्कि सक्षम न्यायालय करेगा. अदालत ने अगले आदेश तक इस तरह की कार्रवाई पर रोक लगा दी है. यही वजह है कि रांची सहित कई इलाकों में सरकारी अमीन और अंचल कार्यालय निजी जमीन की नापी से हाथ खींच रहे हैं. इस आदेश का सबसे बड़ा असर उन लोगों पर पड़ा है, जिन्होंने हाल के महीनों में प्लॉट खरीदा है या खरीदने की तैयारी कर रहे हैं. सामान्य तौर पर खरीदार जमीन खरीदने से पहले सीमा स्पष्ट कराने, पड़ोसी प्लॉट से मिलान कराने, वास्तविक रकबा देखने, रास्ता और कब्जे की स्थिति समझने के लिए सरकारी सीमांकन पर निर्भर रहते थे. अब यही प्रक्रिया ठप पड़ने लगी है.
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जमीन खरीदने वालों की बढ़ी परेशानी, कागज है लेकिन नापी नहीं
रांची शहर और आसपास के इलाकों में जमीन खरीद-बिक्री के दौरान सबसे बड़ी जरूरत होती है कि जमीन का वास्तविक सीमांकन हो, ताकि खरीदार को पता चल सके कि वह जो जमीन खरीद रहा है, उसकी चारदीवारी कहां तक है, नक्शे और रकबे में फर्क तो नहीं, रास्ता बाधित तो नहीं, और जमीन पर किसी दूसरे का कब्जा तो नहीं. लेकिन अब हालात यह हैं कि कागज होने के बावजूद जमीन की सरकारी नापी नहीं हो पा रही. इससे खरीदारों में अनिश्चितता बढ़ी है. कई लोग एग्रीमेंट या रजिस्ट्री से पहले सीमांकन कराना चाहते हैं, लेकिन अंचल स्तर पर स्पष्ट जवाब नहीं मिल रहा. नतीजा यह है कि कई सौदे अटक रहे हैं, कई लोग खरीद टाल रहे हैं और कई रजिस्ट्रियां धीमी पड़ गई हैं.


