Ranchi: झारखंड की सियासत में इन दिनों कुर्सी की गर्मी मई-जून की तपिश को भी मात देती दिख रही है. मामला है राज्यसभा चुनाव की दो सीटों का. एक सीट दिशोम गुरु शिबू सोरेन के असमय निधन के बाद खाली हुई है, तो दूसरी भाजपा के दीपक प्रकाश का कार्यकाल समाप्त होने की वजह से. अब दिल्ली के ऊपरी सदन का टिकट किसे मिलेगा. इसे लेकर रांची से दिल्ली तक शह और मात का ऐसा खेल शुरू हो गया है. निर्वाचन आयोग ने तारीखों का ऐलान क्या किया, नेताओं के चेहरों पर वैसे ही रौनक आ महागठबंधन के पास दोनों सीटों को अपनी जेब में डालने का जादुई आंकड़ा तो है, लेकिन ट्विस्ट यह है कि यहां हर कोई खुद को जादूगर मान रहा है. उधर, भाजपा संख्या बल में पीछे होकर भी अंतरात्मा की आवाज वाले पुराने और अचूक नुस्खे के दम पर हुंकार भर रही है.

महागठबंधन में गणित पक्का है, पर दिल धक-धक है
कागज पर देखें तो महागठबंधन (झामुमो,कांग्रेस,राजद) के पास इतनी सीटें हैं कि वे दोनों उम्मीदवारों को आसानी से दिल्ली की फ्लाइट का टिकट थमा सकते है. लेकिन राजनीति कागज से नहीं, महत्वाकांक्षा से चलती है. कांग्रेस इस बार बड़े भाई झामुमो के सामने सीना ताने खड़ा है कि एक सीट तो दावा हमारा है. कांग्रेस के खेमे में टिकट के दावेदारों की कतार लगी है. निवर्तमान प्रदेश अध्यक्ष राजेश ठाकुर, पुराने कांग्रेसी प्रदीप बलमुचू, वरिष्ठ नेता सुबोधकांत सहाय और फुरकान अंसारी लाइन में सबसे आगे कोहनी मार रहे है. इस रेस में एक नया और दिलचस्प नाम उभरा है, शहजादा अनवर का शहजादा साहब ने तो सीधे आलाकमान मल्लिकार्जुन खड़गे को चिट्ठी लिखकर हक मांग लिया है.
हवा का रूख भांप रहा झामुमो
दूसरी तरफ, सूबे की सत्ता की चाबी संभालने वाली झामुमो ने फिलहाल हवा का रूख भांपते हुए वेट एंड वॉच की पॉलिस पर कायम है. झामुमो के रणनीतिकारों ने अभी तक अपने पत्ते नहीं खोले हैं, जिससे कांग्रेस की धड़कनें बढ़ी हुई है. इसी बीच, शिबू सोरेन की बेटी अंजलि सोरेन ने खुलकर चुनाव लड़ने की इच्छा जता दी है. अंजलि सोरेन के इस दांव ने पार्टी के भीतर और बाहर कई दिग्गजों की बोलती बंद कर दी है.
भाजपा का महा-ट्विस्ट: नो निर्दलीय, ओनली अपना बंदा
भगवा ब्रिगेड ने इस बार शुरुआत में ही साफ कर दिया है कि नो एक्सपेरिमेंट. पार्टी इस बार किसी निर्दलीय (बिजनेसमैन या रसूखदार) को कंधे पर बैठाकर वैतरणी पार करने के मूड में नहीं है. साफ कह दिया गया है कि मैदान में पार्टी का अधिकृत और वफादार उम्मीदवार ही उतरेगा. इस घोषणा के बाद भाजपा के भीतर भी रेस तेज हो गई है. रेस में दीपक प्रकाश (दोबारा जाने की आस में), पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास और आशा लकड़ा के नाम तैर रहे है. लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा दो नामों को लेकर है पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा और एक चौंकाने वाला नाम, निशा उरांव का.
तीन संकेतों की इनसाइड स्टोरी
झारखंड के सियासी गलियारों में यह सवाल तैर रहा है कि क्या भाजपा अपने कद्दावर आदिवासी चेहरे अर्जुन मुंडा को दरकिनार कर भारतीय राजस्व सेवा (आइआरएस) की अधिकारी निशा उरांव पर दांव खेलेगी. निशा उरांव का नाम हवा में नहीं तैर रहा है, इसके पीछे तीन बेहद मजबूत राजनीतिक संकेत हैं, जिन्होंने भाजपा के चाणक्यों को सोचने पर मजबूर कर दिया है.
संकेत नंबर एक
निशा उरांव कोई मामूली अफसर नहीं हैं, वह कांग्रेस के कद्दावर नेता, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और मौजूदा विधायक रामेश्वर उरांव की बेटी हैं. अगर भाजपा निशा को टिकट देती है, तो यह कांग्रेस के किले में सबसे बड़ी सेंधमारी होगी. पिता कांग्रेस की नैया पार लगाने में जुटेंगे और बेटी भाजपा के रथ पर सवार होकर दिल्ली जाएंगी. इस क्रॉस-पॉलिटिक्स से कांग्रेस का मनोबल टूटना तय है.
संकेत नंबर दो
भाजपा को हमेशा से ब्यूरोक्रेट्स (पूर्व अफसरों) से खास लगाव रहा है. निशा उरांव की आईआरएस अधिकारी के रूप में एक साफ-सुथरी और पढ़ी-लिखी महिला आदिवासी चेहरे की छवि है. अर्जुन मुंडा के लंबे राजनीतिक करियर के मुकाबले निशा उरांव को लाकर भाजपा एक फ्रेश और यूथ आदिवासी नैरेटिव सेट करना चाहती है.
संकेत नंबर तीन
चूंकि भाजपा के पास बहुमत का आंकड़ा नहीं है, इसलिए उसे महागठबंधन के विधायकों की अंतरात्मा जगानी होगी. अब रामेश्वर उरांव की बेटी अगर मैदान में होगी, तो कांग्रेस और झामुमो के कई विधायकों की अंतरात्मा पिता-पुत्री के संबंधों और क्षेत्रीय समीकरणों के नाम पर वोटिंग के वक्त जाग सकती है.
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