Ranchi: झारखंड सरकार के नीति-नियंताओं और सचिवालय सेवा के पदाधिकारियों के घर में इस बार चैत की गर्मी जेब खाली होने के कारण ज्यादा महसूस हो रही है. आधा अप्रैल बीत जाने के बाद भी राज्य के मुख्य सचिवालय में मार्च महीने के वेतन का दर्शन नहीं हुआ है. जो अधिकारी पूरे राज्य के विकास का बजट बनाते हैं, वे आज खुद अपने बच्चों के स्कूल एडमिशन और किताबों के लिए उधारी और जुगाड़ के चक्रव्यूह में फंसे हैं. इस पूरे संकट की पटकथा कार्मिक विभाग की उन अव्यावहारिक नीतियों ने लिखी है, जिसने प्रशासनिक व्यवस्था को अराजकता की दहलीज पर खड़ा कर दिया है. इसको लेकर सचिवालय़ सेवा संघ ने भी रोष जताय़ा है.
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प्रोन्नति का अजीब खेल, पद कहीं, तैनाती कहीं
भीतर का असली पेच कार्मिक विभाग की वह कार्यशैली है, जहां पदाधिकारियों को प्रोन्नति तो दी गई, लेकिन उन्हें उनके मूल प्रोन्नत पदों पर भेजने के बजाय वर्तमान पदों को ही उत्क्रमित कर वहीं बिठाए रखा गया. नतीजा यह हुआ कि फाइलों में कई अधिकारी ऐसे पदों पर काम कर रहे हैं जो विभाग में स्वीकृत ही नहीं हैं. दूसरी तरफ, जिन विभागों में अफसरों की सख्त जरूरत थी, वहां कुर्सियां महीनों से धूल फांक रही हैं.
ट्रेजरी की अचानक जागी नींद और वेतन पर ग्रहण
सालों से इसी जुगाड़ तंत्र पर वेतन बंटता रहा, बजट पास होता रहा, लेकिन ट्रेजरी घोटाले के बाद जब जांच की आंच आई, तो ट्रेजरी विभाग की नींद अचानक टूट गई. अब उन पदस्थापनाओं पर तकनीकी आपत्तियां जताई जा रही हैं, जिन्हें कल तक वित्त विभाग और ट्रेजरी ने अपनी मौन सहमति दे रखी थी.
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सचिवालय संघ का आक्रोश: अफसरों की संवेदनशीलता पर सवाल
झारखंड सचिवालय सेवा संघ ने इस स्थिति पर गहरा रोष व्यक्त किया है. संघ का कहना है कि मार्च का वेतन अप्रैल में मिलना एक परंपरा है, लेकिन इस बार अप्रैल का आधा महीना बीतने के बाद भी सन्नाटा पसरा है. यह वह समय है जब मध्यमवर्गीय परिवारों पर स्कूल फीस, यूनिफॉर्म और आयकर का सबसे भारी बोझ होता है.
