नई दिल्ली/कोलकाता: पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट के पुनरीक्षण ( SIR) को लेकर चल रहे विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया है. मंगलवार को शीर्ष अदालत ने कलकत्ता हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को राज्य में लंबित 80 लाख दावों और आपत्तियों के निपटारे के लिए पड़ोसी राज्यों झारखंड और ओडिशा से सिविल जजों और न्यायिक अधिकारियों को बुलाने की अनुमति दे दी है.
जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की विशेष बेंच ने यह आदेश कलकत्ता हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस द्वारा लिखे गए एक पत्र के बाद दिया.
पत्र में स्पष्ट किया गया था कि बंगाल में वर्तमान में तैनात 250 जिला जज अगर इस काम में लगते हैं, तो भी 80 लाख दावों को निपटाने में कम से कम 80 दिन लगेंगे. समय की भारी कमी और स्थिति की गंभीरता को देखते हुए, कोर्ट ने बाहरी राज्यों के न्यायिक अधिकारियों की मदद लेने का निर्देश दिया.
सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख निर्देश
बेंच ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए कई आदेश जारी किए हैं, जिनमें कहा गया है कि कलकत्ता हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस अब झारखंड और ओडिशा के अपने समकक्षों से अनुरोध कर समान रैंक के न्यायिक अधिकारियों को तैनात कर सकेंगे.
चुनाव आयोग को निर्देश दिया गया है कि वह दूसरे राज्यों से आने वाले इन न्यायिक अधिकारियों का सारा खर्च उठाए. सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को 28 फरवरी तक फाइनल इलेक्टोरल रोल (वोटर लिस्ट) प्रकाशित करने की अनुमति दी है.कोर्ट ने साफ किया कि यदि सत्यापन प्रक्रिया जारी रहती है, तो आयोग बाद में सप्लीमेंट्री लिस्ट भी जारी कर सकता है.
क्यों पैदा हुआ यह संकट?
यह पूरा विवाद 2002 की वोटर लिस्ट से जुड़ी विसंगतियों के कारण शुरू हुआ. जांच में पाया गया कि कई जगह माता-पिता के नाम में अंतर है.सबसे चौंकाने वाला ‘लॉजिकल अंतर’ उम्र को लेकर था, जहां वोटर और उसके माता-पिता के बीच उम्र का फासला 15 साल से कम या 50 साल से अधिक दर्ज है.
20 फरवरी को हुई सुनवाई में कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार और चुनाव आयोग के बीच चल रही खींचतान और भरोसे की कमी पर गहरा अफसोस जताया था. बेंच ने इसे एक दुर्भाग्यपूर्ण आरोप-प्रत्यारोप करार देते हुए कहा कि लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार और पोल पैनल के बीच इस तरह का टकराव दुखद है. इसी अविश्वास को खत्म करने के लिए बाहरी राज्यों के जजों को बुलाने का निर्देश दिया गया है.
