Hazaribagh : चौपारण प्रखंड के पुरातात्विक महत्व से जुड़े हरहिंदर, सोहरा और देहर क्षेत्र अब देश के महत्वपूर्ण पुरातात्विक मानचित्र पर दर्ज हो गए हैं. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI), रांची जोन की विशेषज्ञ टीम ने दो दिनों तक इन क्षेत्रों. का विस्तृत वैज्ञानिक सर्वेक्षण कर प्राचीन मूर्तियों, मंदिर अवशेषों, आयरन स्लैग, मृद्भांड, प्राचीन बसावटों और अन्य पुरावशेषों का दस्तावेजीकरण किया. सर्वेक्षण के बाद इन स्थलों का प्रारंभिक अभिलेख भारतीय पुरातत्व विभाग के रिकॉर्ड में दर्ज कर लिया गया है। सर्वेक्षण दल में पुरातत्वविद् डॉ. नीरज कुमार मिश्रा, तपन बारिक तथा छायाकार केंद्रेश कुमार शामिल थे। टीम ने क्षेत्र में उपलब्ध पुरातात्विक साक्ष्यों की जीपीएस मैपिंग, फोटोग्राफी और तकनीकी दस्तावेज तैयार किए, जिन्हें आगे उच्च अधिकारियों को भेजा जाएगा. इसके बाद इन स्थलों पर विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी.
देहर गांव में खुले आसमान के नीचे पड़ी हैं अमूल्य प्रतिमाएं
सर्वेक्षण के दौरान देहर गांव में हजारों वर्ष पुरानी लगभग पांच दर्जन से अधिक दुर्लभ प्रस्तर प्रतिमाएं खुले आसमान के नीचे मिलीं. इनमें देवी-देवताओं की प्रतिमाओं के साथ मंदिर स्थापत्य के कई महत्वपूर्ण अवशेष भी शामिल हैं. वर्षों से खुले में पड़े रहने के कारण इन पर मौसम की मार पड़ रही है, जिससे इनके क्षतिग्रस्त होने का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है. स्थानीय ग्रामीणों ने इन प्रतिमाओं के संरक्षण की मांग की है. पुरातत्व विशेषज्ञों का मानना है कि इनका संरक्षण न केवल क्षेत्र की ऐतिहासिक धरोहर को बचाएगा, बल्कि भविष्य में यह स्थान सांस्कृतिक पर्यटन का भी महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है.

हजारों वर्ष पुरानी सभ्यता के मिले प्रमाण
सर्वेक्षण में चौपारण और चतरा क्षेत्र में प्राचीन मानव बसावट के स्पष्ट संकेत मिले हैं. बड़ी मात्रा में प्राप्त मृद्भांड (मिट्टी के बर्तनों के अवशेष) इस बात की पुष्टि करते हैं कि यह क्षेत्र प्राचीन काल से ही आबाद रहा है. विशेषज्ञों के अनुसार, निर्माण कार्यों के दौरान मिलने वाले काले और लाल रंग के मृद्भांड तथा ब्लैक पॉलिश्ड वेयर (विशेष प्रकार के चमकदार पात्र) इस क्षेत्र में विकसित सभ्यता के महत्वपूर्ण प्रमाण हैं. इन अवशेषों से यहां के लोगों के रहन-सहन, खान-पान और सांस्कृतिक जीवन की जानकारी मिलती है. सर्वेक्षण के दौरान बड़ी मात्रा में आयरन स्लैग (लौह गलाने के बाद बचने वाला अवशेष) भी मिला. विशेषज्ञों के अनुसार, यह प्रमाण बताते हैं कि चौपारण क्षेत्र प्राचीन काल में लौह उत्पादन का प्रमुख केंद्र रहा होगा. लौह गलाने की तकनीक, भट्टियों के अवशेष तथा स्लैग की मौजूदगी से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि यहां केवल कृषि आधारित जीवन ही नहीं था, बल्कि धातु उद्योग भी विकसित अवस्था में था.
हरहिंदर में मिली प्राचीन सती शिला
हरहिंदर गांव में सर्वेक्षण के दौरान प्राचीन सती स्मारक (सती शिला) का भी दस्तावेजीकरण किया गया. विशेषज्ञों के अनुसार, शिलालेख और प्रस्तर शैली के आधार पर इसका काल लगभग 14वीं से 15वीं शताब्दी का माना जा रहा है. सर्वेक्षण के दौरान गांव में एक प्राचीन मंदिर परिसर के अवशेष भी मिले, जहां नालीनुमा संरचना, पत्थर की चौखट और प्रस्तर प्रतिमाएं प्राप्त हुईं. इनमें विष्णु, शिव तथा अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं शामिल हैं. मंदिर परिसर के ये अवशेष क्षेत्र की समृद्ध धार्मिक और स्थापत्य परंपरा की ओर संकेत करते हैं. सोहरा गांव में भी सर्वेक्षण दल ने अनेक पुरातात्विक अवशेषों का रिकॉर्ड तैयार किया. यहां प्राप्त मंदिर अवशेष, प्रस्तर खंड और प्राचीन निर्माण शैली इस क्षेत्र की ऐतिहासिक समृद्धि को दर्शाती है.
आगे होगा विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन
पुरातत्वविदों का कहना है कि यह सर्वेक्षण केवल प्रारंभिक चरण है. तैयार किए गए दस्तावेजों के आधार पर आगे विस्तृत उत्खनन, वैज्ञानिक अध्ययन और संरक्षण की योजना बनाई जाएगी. यदि भविष्य में व्यवस्थित खुदाई होती है, तो चौपारण क्षेत्र के इतिहास से जुड़े कई नए तथ्य सामने आ सकते हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि हरहिंदर, देहर और सोहरा जैसे स्थल झारखंड के प्राचीन इतिहास, लौह संस्कृति, मंदिर स्थापत्य और प्रारंभिक मानव बसावट के अध्ययन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं. समय रहते इन धरोहरों का संरक्षण किया गया, तो यह क्षेत्र न केवल ऐतिहासिक दृष्टि से, बल्कि पर्यटन और शोध के क्षेत्र में भी नई पहचान बना सकता है.
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