Hazaribagh: सीसीएल की बड़ी कोयला परियोजनाओं ने हजारीबाग, चतरा और लातेहार के प्रभावित इलाकों की तस्वीर बदल दी, लेकिन जमीन देने वाले कई किसान आज भी अपने हक के लिए भटक रहे हैं. मगध, आम्रपाली, चंद्रगुप्त और संघमित्रा कोयला परियोजनाओं के विस्तार के लिए केरेडारी, टंडवा और बालूमाथ अंचल में बड़े पैमाने पर जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया हुई. बताया जाता है कि इन परियोजनाओं से 40 हजार एकड़ से अधिक जमीन प्रभावित हुई है. इसमें वनभूमि, जीएम भूमि, जंगल-झाड़ी और रैयती जमीन शामिल है. जमीन देने वाले किसानों का कहना है कि उन्हें मिलने वाला मुआवजा वर्तमान बाजार मूल्य और जमीन से होने वाले कोयला कारोबार की तुलना में काफी कम है. वहीं, अधिग्रहण के वर्षों बाद भी कई रैयत मुआवजा और नौकरी की प्रक्रिया पूरी होने का इंतजार कर रहे हैं.

वनभूमि के लिए करीब 70 लाख रुपये प्रति एकड़ भुगतान का दावा
किसानों के बीच मुआवजे को लेकर सबसे बड़ा सवाल वनभूमि और रैयती जमीन के भुगतान में अंतर को लेकर है. उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वनभूमि के उपयोग के लिए सीसीएल को संबंधित विभागों को करीब 70 लाख रुपये प्रति एकड़ तक का भुगतान करना पड़ता है. इसके अलावा पौधरोपण सहित अन्य मदों में भी राशि खर्च होती है. वहीं जीएम और जंगल-झाड़ी जमीन के लिए भी राज्य सरकार को करीब 70 से 80 लाख रुपये प्रति एकड़ तक भुगतान किए जाने की बात सामने आ रही है.
रैयती जमीन के बदले करीब नौ लाख रुपये
इसके विपरीत किसानों को रैयती जमीन के बदले करीब नौ लाख रुपये प्रति एकड़ मुआवजा दिए जाने की बात कही जा रही है. किसानों का सवाल है कि जब सरकारी और वनभूमि के लिए इतनी बड़ी राशि का भुगतान किया जा सकता है, तो रैयती जमीन के मालिकों को उचित मुआवजा देने में इतनी कमी क्यों है. किसानों का कहना है कि जमीन उनके परिवार की आय और भविष्य का मुख्य आधार थी. जमीन अधिग्रहित होने के बाद पर्याप्त मुआवजा और रोजगार नहीं मिलने से उनके सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया है.
आम्रपाली और चंद्रगुप्त में शुरू हो चुका है उत्पादन
आम्रपाली कोल परियोजना में करीब 431 हेक्टेयर वनभूमि पर कोयला उत्पादन होने की बात सामने आई है. वहीं चंद्रगुप्त कोल परियोजना में करीब 600 हेक्टेयर जमीन पर उत्पादन शुरू हो चुका है. इन परियोजनाओं के लिए संबंधित विभागों से जमीन लेने की प्रक्रिया में सीसीएल को निर्धारित राशि का भुगतान करना पड़ता है.किसानों का कहना है कि सरकारी विभागों को उनकी जमीन का भुगतान समय पर मिल जाता है, लेकिन रैयती जमीन के मालिकों को मुआवजे और नौकरी के लिए लंबे समय तक कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते हैं.
जमीन गई, रोजगार की उम्मीद भी अधूरी
प्रभावित किसानों की परेशानी सिर्फ मुआवजे तक सीमित नहीं है. जमीन देने के बाद कई परिवार रोजगार की उम्मीद लगाए बैठे हैं. किसानों का कहना है कि जमीन चली जाने के बाद परिवार की आजीविका का स्थायी आधार खत्म हो गया. ऐसे में नौकरी और पुनर्वास उनके भविष्य के लिए बेहद जरूरी है.
वर्षों बाद भी समाधान का इंतजार
कोयला परियोजनाओं से उत्पादन लगातार बढ़ रहा है, लेकिन परियोजनाओं के लिए जमीन देने वाले कई परिवार आज भी अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं. किसानों की मांग है कि लंबित मुआवजा और नौकरी के मामलों का शीघ्र निपटारा किया जाए तथा जमीन की मौजूदा कीमत को ध्यान में रखते हुए मुआवजा राशि पर पुनर्विचार किया जाए.

