गिरिडीह: जिले के बिरनी प्रखंड अंतर्गत करमा गांव में अवैध पत्थर खनन का मामला अब गंभीर रूप लेता जा रहा है. नदी किनारे संचालित दो खदानों में से केवल एक पर कार्रवाई होने से न सिर्फ खनन विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं, बल्कि प्रशासनिक निष्पक्षता भी कठघरे में नजर आ रही है. पूरे इलाके में इस मुद्दे को लेकर चर्चा और आक्रोश बढ़ता जा रहा है.
स्थानीय लोगों के अनुसार, करमा गांव में नदी से सटे दो पत्थर खदान लंबे समय से संचालित हैं. नियम के मुताबिक किसी भी जलस्रोत, यानी नदी या नाला, से खदान की दूरी कम से कम 500 मीटर होनी चाहिए, ताकि पर्यावरण संतुलन बना रहे और जल स्रोत सुरक्षित रहें. लेकिन अंचल कार्यालय की रिपोर्ट में दोनों खदानों की दूरी 500 मीटर दर्शाई गई है, जबकि वास्तविक दूरी करीब 20 मीटर बताई जा रही है. इस कथित “कागजी खेल” के कारण खदान संचालकों को आसानी से लीज की स्वीकृति मिल गई और वर्षों तक खुलेआम खनन होता रहा.
मामला तब सामने आया जब उपायुक्त रामनिवास यादव के हस्तक्षेप के बाद अंचलाधिकारी संदीप मधेसिया और माइनिंग इंस्पेक्टर विश्वनाथ उरांव ने संयुक्त जांच की. 20 मार्च 2026 को किए गए निरीक्षण में “मां तारा स्टोन माइंस” में कई गंभीर अनियमितताएं पाई गईं. स्वीकृत 2.30 एकड़ के मुकाबले 4.56 एकड़ अतिरिक्त भूमि पर खनन, नदी की सीमा से सटकर खनन, सरकारी भूमि का अतिक्रमण और बिना वैध अनुमति के संचालन जैसे मामले सामने आए. इसके बाद भरकट्टा ओपी में संचालक अशोक मेहता और महेंद्र कुमार मेहता के खिलाफ एमएमडीआर एक्ट समेत अन्य धाराओं में प्राथमिकी दर्ज की गई.
हालांकि सबसे बड़ा सवाल यह है कि ठीक बगल में संचालित दूसरी खदान पर अब तक कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई है. जानकारी के अनुसार, उस खदान की स्थिति भी लगभग समान है. नदी से दूरी कम है, पर्यावरणीय नियमों का उल्लंघन हो रहा है और सीमांकन पर भी सवाल हैं. इसके बावजूद कार्रवाई सिर्फ एक खदान तक सीमित रहने से कई तरह के संदेह पैदा हो रहे हैं.
इस संबंध में पूछे जाने पर सीओ संदीप मधेसिया ने माना कि दूरी का नियम यहां लागू नहीं हो रहा है. वहीं एसडीओ संतोष गुप्ता ने भी स्वीकार किया कि दूसरी खदान नदी से सटी हुई है और इसका भौतिक सत्यापन किया जा चुका है. इसके बावजूद कार्रवाई न होना प्रशासन की निष्पक्षता पर सवाल खड़े करता है.
स्थानीय लोगों के बीच अब यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या खनन विभाग चयनात्मक कार्रवाई कर रहा है. क्या दूसरे खदान संचालक को किसी तरह का संरक्षण प्राप्त है. क्या जांच को जानबूझकर सीमित रखा गया है. कुछ लोगों का कहना है कि “ऊपर तक सेटिंग” के कारण ही एक खदान पर कार्रवाई हुई और दूसरे को छोड़ दिया गया.
इस पूरे मामले में पर्यावरण और सरकारी राजस्व को भी बड़ा नुकसान हो रहा है. नदी के किनारे खनन से जलस्तर और पारिस्थितिकी पर खतरा बढ़ रहा है, जबकि सरकारी जमीन पर अवैध खनन से राजस्व की हानि हो रही है. अवैध भंडारण और तस्करी से भी करोड़ों रुपये का नुकसान बताया जा रहा है.
फिलहाल पुलिस मामले की जांच कर रही है. लेकिन अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि क्या दूसरी खदान पर भी कार्रवाई होगी. क्या खनन और अंचल विभाग की भूमिका की जांच की जाएगी. या फिर मामला केवल एक एफआईआर तक सीमित रह जाएगा.
यह मामला सिर्फ एक अवैध खदान का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करता है. यदि दोनों खदान नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं, तो कार्रवाई भी समान होनी चाहिए. अन्यथा यह न्याय नहीं, बल्कि चयनात्मक कार्रवाई मानी जाएगी.
