रांची: झारखंड में नेशनल हाईवे और एक्सप्रेसवे के जाल बिछाने की कीमत राज्य की हरियाली को चुकानी पड़ रही है. पिछले पांच वर्षों में राज्य में सड़क चौड़ीकरण और नए कॉरिडोर बनाने के नाम पर 1,05,753 से अधिक पेड़ों को काटा गया है.
संसद में दी गई जानकारी के अनुसार झारखंड उन राज्यों की सूची में शामिल है, जहां सड़क विकास के लिए बड़े पैमाने पर वन भूमि का डायवर्जन हुआ है. झारखंड उन शीर्ष 5 राज्यों में शामिल है, जहां सबसे अधिक वन भूमि का गैर-वानिकी कार्यों जैसे सड़क, खनन और सिंचाई के लिए उपयोग किया गया.
22,233 हेक्टेयर वन भूमि सड़क के लिए डायवर्ट
सड़कों के लिए अब तक लगभग 22,233 हेक्टेयर वन भूमि को डायवर्ट किया जा चुका है. रांची-जमशेदपुर (एनएच-33), रांची-बोकारो कॉरिडोर और वाराणसी-रांची-कोलकाता एक्सप्रेसवे जैसी बड़ी परियोजनाओं में सबसे अधिक पेड़ काटे गए हैं.
सरकार का तर्क है कि जितने पेड़ काटे गए हैं, उससे कहीं अधिक संख्या में पौधारोपण किया जा रहा है. नेशनल ग्रीन हाईवे पॉलिसी के तहत 2015 से अब तक झारखंड में लगभग 9.13 लाख पौधे लगाने का दावा किया गया है.
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वन भूमि पर अवैध कब्जा बड़ी चुनौती
झारखंड में वन भूमि पर अवैध अतिक्रमण एक गंभीर समस्या बनी हुई है. राज्य के विभिन्न जिलों में लगभग 29,000 एकड़ से अधिक वन भूमि पर अवैध कब्जा है. सबसे अधिक अतिक्रमण कोल्हान, पलामू और हजारीबाग प्रमंडलों में पाया गया है.
वन विभाग ने अतिक्रमणकारियों के खिलाफ भारतीय वन अधिनियम के तहत मामले दर्ज किए हैं, लेकिन कानूनी पेचीदगियों और स्थानीय विरोध के कारण बेदखली की प्रक्रिया धीमी है.
