रांचीः झारखंड के सभी कैबिनेट मंत्री पिछले एक साल से परिवर्तन की रेस में दौड़ तो रहे हैं, लेकिन दिक्कत यह है कि वे ट्रेडमिलपर दौड़ रहे हैं. पसीना बहुत निकल रहा है, पर पहुंच कहीं नहीं रहे हैं. जनता अब 15 अप्रैल की कैबिनेट बैठक का इंतजार कर रही है, जहां शायद एक बार फिर ऐतिहासिक फैसलों की ऐसी खिचड़ी पकेगी, जिसे पचाना केवल झारखंडी जनता के ही बस की बात होगी.
डॉ. इरफान अंसारी: इलाज से ज्यादा मंत्री के बयानों से मिल रही है ऑक्सीजन
जब से डॉ. इरफान अंसारी ने स्वास्थ्य विभाग की कमान संभाली है, तब से अस्पतालों में दवाओं की कमी हो न हो, लेकिन सोशल मीडिया पर मंत्री जी के वीडियो की कोई कमी नहीं है. उनकी कार्यशैली ऐसी है कि डॉक्टर मरीज की नब्ज बाद में देखते हैं, पहले मंत्री जी का फेसबुक लाइव चेक करते हैं. मंत्री की कार्यशैली किसी सर्जिकल स्ट्राइक से कम नहीं है. वे अस्पताल पहुंचते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे किसी फिल्म की शूटिंग हो रही हो. डॉक्टरों को फटकार लगाना, सस्पेंड करने की धमकी देना और फिर कैमरे की तरफ देख कर मुस्कुरा देना, यह उनकी कार्यशैली का ट्रेडमार्क बन चुका है. जनता अब भ्रमित है कि उसे सरकारी अस्पताल में इलाज करवाने जाना है या मंत्री जी का शो देखने. स्वास्थ्य सुविधाओं पर सवाल पूछो, तो वे विपक्ष को ऐसी एंटीबायोटिक देते हैं कि सवाल पूछने वाला ही कोमा में चला जाता है.

हफीजुल हसन (जल संसाधन): जहां प्यास बुझाने से ज्यादा सियासी प्यास है अहम
मंत्री जी के विभाग का नाम जल संसाधन है, लेकिन पिछले एक साल में जनता को पानी कम और आश्वासन के बुलबुले ज्यादा मिले हैं. उनकी कार्यशैली कुछ ऐसी है कि नहरें सूखी हैं मगर फाइलों में विकास का सैलाब उमड़ रहा है. बड़े-बड़े बांधों की मरम्मत का वादा, जो मानसून आते ही बह गए. मंत्री जी का जल संसाधन ऐसा है कि खेत तक पानी पहुंचे न पहुंचे, पर उनकी सियासी कश्ती हमेशा लहरों पर रहती है.

योगेंद्र प्रसाद (पेयजल एवं स्वच्छता): नल-जल का ऐसा जादू, जो दिखता कम है, चुभता ज्यादा है
नल से जल पहुंचे न पहुंचे, पर योगेंद्र जी की मुस्कान हर पोस्टर पर पहुंच जाती है. पिछले एक साल में पेयजल विभाग ने पाइपलाइन से ज्यादा हेडलाइन पर ध्यान दिया है. हर घर जल का दावा, जबकि हकीकत में कई गांवों में आज भी हर घर बाल्टी का संघर्ष जारी है.

दीपिका पांडेय सिंह (ग्रामीण विकास): फाइलों के पहाड़ और गांवों का खाली हाथ
झारखंड की ग्रामीण सड़कों की हालत और मंत्री दीपिका के वादों में एक समानता है. दोनों ही कच्चे हैं. एक साल में इन्होंने महिला सशक्तिकरण के इतने भाषण दिए कि गांवों की महिलाएं अब भी सोच रही हैं कि राशन कार्ड सुधरेगा या सिर्फ भाषण. सोशल मीडिया पर अति-सक्रिय, धरातल पर अति-सुस्त.

सुदिव्य सोनू (नगर विकास): स्मार्ट सिटी या सिर्फ स्मार्ट’ बयान
गिरिडीह से आने वाले मंत्री सुदिव्य अब राजधानी और नगरों को चमकाने का जिम्मा संभाले हुए हैं. नगर विकास विभाग शहर के नालों को तो नहीं सुधार पाया, लेकिन उन्होंने नगर निगमों के अधिकारों की सर्जरी बखूबी की है. कचरा प्रबंधन इतना शानदार है कि शहर के लोग अब कचरे को लैंडमार्क मानने लगे हैं.

चमरा लिंडा (कल्याण): आदिवासियों का कल्याण या अपना सम्मान
कल्याण मंत्री के रूप में चमरा लिंडा ने पिछले एक साल में कई मौन व्रत रखे. आदिवासियों के हक की बात आई तो वे ऐसे गायब हुए जैसे हॉस्टल से छात्र गायब होते हैं. स्कॉलरशिप के इंतजार में छात्र बूढ़े हो गए पर मंत्री चमरा लिंडा की कल्याणकारी कछुआ चाल नहीं बदली.

दीपक बिरूआ (भू-राजस्व एवं परिवहन): जमीन का खेल और परिवहन की रेल
मंत्री दीपक बिरूआ के विभाग में जमीन के रिकॉर्ड इतने साफ हैं, कि खुद मालिक को पता नहीं चलता कि उसकी जमीन किसकी हो गई. परिवहन मंत्री के तौर पर उन्होंने बस अड्डों को ऐसा हाई-टेक बनाया है, कि लोग अब स्टेशन जाने के लिए भी पैदल चलना पसंद कर रहे हैं. भू-राजस्व एवं परिवहन मंत्री दीपक बिरूआ के विभाग में फाइलों की रफ्तार एक्सप्रेस है, बशर्ते पहियों में ग्रीस लगा हो.

राधाकृष्ण किशोर (वित्त): बजट का जादूगर
वित्त मंत्री का काम ही है, खजाना खाली है पर उम्मीदें भरी हैं. पिछले एक साल में उन्होंने झारखंड की अर्थव्यवस्था को ऐसे संभाला है कि अब उधार लेने के लिए भी नया सॉफ्टवेयर ढूंढना पड़ रहा है. कर्मियों की सैलरी अटक गई है. घोषणाओं में करोड़ों की बारिश, खातों में चंद रुपयों की ओलावृष्टि.

शिल्पी नेहा तिर्की (कृषि): खेती-किसानी या सिर्फ फोटो-अप
कृषि विभाग ने पिछले एक साल में खाद से ज्यादा खिंचाव यानि कैमरे की ओर पर ध्यान दिया है. मंत्री शिल्पी ने युवाओं को खेती से जोड़ने के लिए इतने ट्वीट किए कि किसान अब मोबाइल चार्जर ढूंढ रहे हैं, बीज नहीं. सुखाड़ राहत की ऐसी घोषणाएं, जो किसान के घर पहुंचते-पहुंचते खुद सूख गईं.

रिपोर्ट: रवि भारती
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