Sahibganj: आजादी के नायक सिद्धू-कान्हू का जन्म 11 अप्रैल 1815 को भोगनाडीह में हुआ था. सिद्धू-कान्हू जयंती समारोह छठीहार महा के रूप में मनाया जाता है. इस बार 211 जयंती वर्ष पूरे हो रहे हैं. यह दिन 1855 के उस संघर्ष की याद दिलाता है, जब अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति का बिगुल फूंकने वाले सिद्धू-कान्हू का जन्म हुआ था. हर साल 11 अप्रैल को यह धरती उनकी जयंती के उत्सव में सराबोर हो जाती है. सिद्धू-कान्हू जयंती कोई साधारण समारोह नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक है, जो पीढियों से संताल समाज की पहचान रही है. यह उत्सव बताता है कि इतिहास की डोर कभी टूटती नहीं, बस उसे नये रंगों से सजाया जाता है.
खपरैल के घर से शुरु हुई आजादी की जंग
ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ देश का प्रथम आंदोलन 1855 में झारखंड के सुदूरवर्ती जिला साहिबगंज के बरहेट प्रखंड के भोगनाडीह से शुरु हुआ था. यह आंदोलन दो साल तक चला. गरीब तबका आदिवासी और गैर आदिवासियों को सेठ-साहूकारों द्वारा शोषण किया जा रहा था. इसी को लेकर भोगनाडीह की धरती से चार भाई और दो बहन, सिद्धू-कान्हू, चांद-भैरव और फूलो-झानो ने आंदोलन का बिगुल फूंका. खास बात है कि खपरैल के घर में जन्म लेकर पले-बढे इन वीरों ने देश की गुलामी से मुक्ति और शोषण के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की. तकरीबन दो वर्षों तक चली इस लडाई में 30000 से अधिक आदिवासी अपने देश की आजादी के लिए कुर्बान हो गए. इस लडाई में बाबूपुर स्थित बरगद के पेड पर सिद्धू-कान्हू को फांसी दे दी गई. यह पेड आज भी लोगों को क्रांति की ऊर्जा देता है.
हूल क्रांति ने हिला दी थी अंग्रेजी हुकूमत
अंग्रेजों के खिलाफ इस लडाई को हूल क्रांति का नाम दिया गया. इस दौरान अंग्रेजों ने आदिवासियों पर काफी जुल्म ढाए. इस लडाई में दस हजार से अधिक आदिवासी और गैर आदिवासी सिद्धू-कान्हू के नेतृत्व में शामिल हुए. अपने तीर-कमान और साहस से उन्होंने अंग्रेजों को कडी चुनौती दी. हालांकि कुछ लोगों के विश्वासघात के कारण चांद-भैरव और फूलो-झानो मारे गए. बरहेट प्रखंड के पंचकठिया स्थित क्रांति स्थल पर पीपल के पेड के नीचे सिद्धू और कान्हू को फांसी दी गई. इस लडाई में हजारों लोगों की जान चली गई. अंग्रेजों ने कूटनीति से इस आंदोलन को दबा दिया, लेकिन यह चिंगारी आगे चलकर देशव्यापी आंदोलनों में बदल गई.
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वंशजों ने दी श्रद्धांजलि
वंशज परिवार के सदस्य मंडल मुर्मू ने कहा कि सिद्धू-कान्हू की जयंती पूरे धूमधाम से मनाई जाएगी. उन्होंने बताया कि 1855 से 1856 तक चली इस लडाई में एक ही परिवार के चार भाई और दो बहनों ने अपनी कुर्बानी दी. करीब 30000 आदिवासी और गैर आदिवासी इस आंदोलन में शामिल हुए थे. आज भी पंचकठिया का वह पेड गवाह है, जहां सिद्धू-कान्हू को फांसी दी गई थी. उन्होंने कहा कि उस समय न शिक्षा थी, न संचार के साधन और न ही आधुनिक हथियार, फिर भी लोगों में देश के प्रति प्रेम और बलिदान की भावना थी. आज हम इन्हीं वीरों की बदौलत खुली हवा में सांस ले रहे हैं.
परंपरा और आस्था का संगम
सिद्धू-कान्हू की जयंती पर झारखंड, बंगाल, उडीसा और बिहार से हजारों की संख्या में आदिवासी जुटते हैं. जयंती की रात विशेष पूजा-अर्चना की जाती है. विदीन धर्म मानने वाले आदिवासी गुरु के साथ बाबूपुर स्थित क्रांति स्थल पहुंचकर बरगद के पेड की पूजा करते हैं और भोगनाडीह स्थित प्रतिमा पर माल्यार्पण करते हैं.
यह उत्सव सिर्फ श्रद्धा नहीं, बल्कि संताल संस्कृति का जीवंत स्वरूप है. मांझी थान और जाहेर थान जैसे पवित्र स्थलों पर पांच देवी-देवताओं की पूजा होती है. मांझी थान में मारांग बुरू सहित अन्य देवी-देवताओं की पूजा होती है, जबकि जाहेर थान में जाहेर एरा, गोसाई एरा सहित अन्य देवताओं की आराधना की जाती है. रातभर ढोल-नगाडों की थाप पर नृत्य और पारंपरिक गीतों की गूंज बनी रहती है.
जिला प्रशासन की तैयारी तेज
सिद्धू-कान्हू की जयंती को लेकर जिला प्रशासन ने तैयारी तेज कर दी है. बरहेट के भोगनाडीह स्थित सिद्धू-कान्हू प्रतिमा की साफ-सफाई और रंग-रोगन कराया जा रहा है. चौक-चौराहों पर पोस्टर और बैनर लगाए जा रहे हैं. बाबूपुर स्थित क्रांति स्थल को भी दुरुस्त किया जा रहा है.
डीडीसी सतीश चंद्रा ने बताया कि जयंती के अवसर पर बाहर से आने वाले लोगों को किसी प्रकार की परेशानी नहीं होगी. सभी अधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश दे दिए गए हैं. विधि-व्यवस्था को लेकर प्रशासन पूरी तरह तैयार है.
