रांची: झारखंड के कोयला क्षेत्रों से विज्ञान जगत को चौंकाने वाली खबरें सामने आई हैं. धनबाद और आसपास की खुली कोयला खदानों में एक ऐसे लुप्त इकोसिस्टम के पुख्ता प्रमाण मिले हैं, जो न केवल मनुष्यों, बल्कि डायनासोरों के धरती पर आने से भी करोड़ों साल पहले अस्तित्व में था. झारखंड के उत्तरी कर्णपुरा बेसिन स्थित अशोक कोयला खदान से पुरावनस्पति विज्ञान और भू-रासायनिक साक्ष्य जुटाए गए हैं.

गोंडवानालैंड का हिस्सा था भारत
वैज्ञानिकों के अनुसार, लगभग 30 करोड़ वर्ष पहले (पर्मियन काल) भारत आज जैसा नहीं था. उस समय यह विशाल दक्षिणी महाद्वीप गोंडवानालैंड का हिस्सा था, जिसमें अंटार्कटिका, दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया भी शामिल थे. अध्ययन में पाया गया है कि आज जहां झुलसाने वाली गर्मी और कोयले के ढेर हैं, वहां कभी विशाल दलदली जंगल और नदियों का एक सघन जाल हुआ करता था.
समुद्र के बढ़ते स्तर ने बदला भूगोल
केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा जारी अध्ययन से पता चला है कि यह क्षेत्र केवल घने जंगलों से ही नहीं घिरा था, बल्कि समय-समय पर समुद्र के प्रभाव में भी आता रहा. वैज्ञानिकों का मानना है कि उस काल में हुए जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र का जलस्तर बढ़ा, जिससे समुद्र का पानी महाद्वीपीय भूभाग के काफी अंदर तक आ गया था.
बीरबल साहनी संस्थान का बड़ा शोध
यह महत्वपूर्ण अध्ययन बीरबल साहनी जीवाश्म विज्ञान संस्थान के नेतृत्व में किया गया है. शोधकर्ताओं को प्राचीन पौधों के असाधारण जीवाश्म और सूक्ष्म रासायनिक संकेत मिले हैं. ये साक्ष्य बताते हैं कि पर्मियन काल में समुद्र की बाढ़ छिटपुट नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण घटना थी जिसने स्थलीय इकोसिस्टम को पूरी तरह प्रभावित किया था.

