पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में नगरपालिका चुनाव के विरोध में कोल्हान बंद, चांडिल में हाईवे जाम

सरायकेला: एक ओर झारखंड में नगरपालिका चुनाव को लेकर मतदान की प्रक्रिया जारी है, वहीं दूसरी ओर पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में नगरपालिका...

सरायकेला: एक ओर झारखंड में नगरपालिका चुनाव को लेकर मतदान की प्रक्रिया जारी है, वहीं दूसरी ओर पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में नगरपालिका चुनाव कराए जाने के विरोध में आदिवासी संगठनों ने कोल्हान बंद का आह्वान किया. इसका आंशिक असर सरायकेला-खरसावां जिले के चांडिल क्षेत्र में देखने को मिला.

चांडिल में राजमार्ग जाम, वाहनों की लंबी कतार

चांडिल थाना क्षेत्र के चिलगु तिलका माझी मोड़ के पास प्रदर्शनकारियों ने टाटा–रांची मुख्य मार्ग (राजमार्ग) को कुछ समय के लिए जाम कर दिया. अचानक हुए सड़क जाम के कारण दोनों ओर वाहनों की लंबी कतार लग गई. यात्री बसें, मालवाहक ट्रक और निजी वाहन कुछ देर तक फंसे रहे.

हालांकि पुलिस की गश्ती टीम की तत्परता से जाम को जल्द ही हटवा दिया गया और यातायात सामान्य कर दिया गया.

आदिवासी संगठनों का क्या है तर्क

प्रदर्शन कर रहे संगठनों के प्रतिनिधियों ने कहा कि कोल्हान क्षेत्र भारतीय संविधान की पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत आता है, जहां पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था और आदिवासी रीति-रिवाजों को संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है. उनका आरोप है कि ऐसे क्षेत्र में नगरपालिका चुनाव कराना असंवैधानिक है और यह आदिवासी स्वायत्तता तथा पारंपरिक ग्रामसभा व्यवस्था को कमजोर करने की कोशिश है.

उन्होंने कहा कि पांचवीं अनुसूची आदिवासी बहुल इलाकों को विशेष अधिकार देती है, जिनके तहत स्थानीय परंपराओं, सामाजिक संरचना और स्वशासन प्रणाली की रक्षा सुनिश्चित की गई है. राज्य सरकार पर इन अधिकारों की अनदेखी कर शहरी निकाय चुनाव थोपने का आरोप भी लगाया गया.

प्रशासन का पक्ष

प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, कानून-व्यवस्था की स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में रही और कहीं से किसी अप्रिय घटना की सूचना नहीं है. चांडिल में बंद का असर सीमित रहा. बाजार और अन्य गतिविधियां सामान्य रूप से संचालित होती रहीं.

सुरक्षा के मद्देनजर संवेदनशील क्षेत्रों में अतिरिक्त पुलिस बल की तैनाती की गई है. प्रशासन ने लोगों से शांति बनाए रखने और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सहयोग करने की अपील की है.

बहस का मुद्दा बना चुनाव

नगरपालिका चुनाव और पांचवीं अनुसूची को लेकर उठा यह विवाद अब राजनीतिक और सामाजिक बहस का विषय बन गया है. आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर सरकार और आदिवासी संगठनों के बीच संवाद की संभावना से इनकार नहीं किया जा रहा है.

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