Hazaribagh: झारखंड हाईकोर्ट ने हजारीबाग जिले के सेवाने नदी, तेपसा गांव और इचाक क्षेत्र में धड़ल्ले से चल रहे अवैध खनन और स्टोन क्रशर संचालन पर कड़ा रुख अख्तियार किया है चीफ जस्टिस एम.एस. सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने इस मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए जिला प्रशासन, खनन विभाग, पुलिस और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को 15 सूत्री सख्त निर्देश जारी किए हैं.
अधिकारियों की चुप्पी बिना मुमकिन नही
कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि भारी मशीनरी और सार्वजनिक सड़कों पर खनिजों के परिवहन के बावजूद प्रशासन की निष्क्रियता “सार्वजनिक कर्तव्य की विफलता” है. खंडपीठ ने स्पष्ट कहा कि अवैध गतिविधियों की गंभीरता को देखते हुए अधिकारियों की ‘बाहरी लाभ’ (मिलीजुली) के आरोपों को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने चिंता जताई कि अधिकारियों को लगता है कि ऐसी लापरवाही से उनके करियर या वेतन पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा.

प्रमुख 15 निर्देश: अब कागजी कार्रवाई से नहीं चलेगा काम
कोर्ट ने प्रशासन के “कागजी आश्वासनों” को दरकिनार करते हुए जमीन पर कार्रवाई सुनिश्चित करने को कहा है जब तक सभी वैधानिक अनुमतियों (विस्फोटक लाइसेंस, प्रदूषण एनओसी, खनन पट्टा) की जांच पूरी नहीं होती, तब तक प्रभावित क्षेत्रों में खनन और क्रशर संचालन बंद रहेगा. जिला स्तरीय टास्क फोर्स को हर महीने बैठक करनी होगी और उसकी कार्यवाही को सार्वजनिक वेबसाइट पर अपलोड करना अनिवार्य होगा. अवैध खनन रोकने के लिए सीसीटीवी, जीपीएस ट्रैकिंग और जियो-फेंसिंग जैसी आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल करने का आदेश दिया गया है. हजारीबाग वाइल्डलाइफ सेंचुरी की 1 किलोमीटर की सीमा के भीतर किसी भी प्रकार के खनन और क्रशर पर पूर्ण प्रतिबंध रहेगा. प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयों पर भारी जुर्माना लगाया जाएगा. साथ ही, अवैध रूप से निकाले गए खनिजों की पूरी कीमत वसूली जाएगी. कोर्ट ने चेतावनी दी है कि यदि इन निर्देशों के पालन में कोई कोताही बरती गई, तो संबंधित अधिकारी व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार होंगे.
पर्यावरण और जीवन के अधिकार का हनन
अदालत ने इसे केवल “प्रशासनिक लापरवाही” न मानकर अनुच्छेद 21 के तहत जनता के जीवन के अधिकार और पर्यावरण पर सीधा आघात बताया है. कोर्ट ने निर्देश दिया है कि अवैध खनन की शिकायतों के लिए तुरंत एक समर्पित हेल्पलाइन और ईमेल आईडी जारी की जाए ताकि आम जनता अपनी शिकायतें दर्ज करा सके.
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