केरल में हार के साथ वामपंथ का आखिरी किला भी ढहा, भारत में वामपंथी राजनीति का एक युग समाप्त

Thiruvananthapuram: केरल विधानसभा चुनाव में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व वाले वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) की करारी हार के साथ ही भारत...

Thiruvananthapuram: केरल विधानसभा चुनाव में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व वाले वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) की करारी हार के साथ ही भारत से वामपंथ का आखिरी सत्ता केंद्र भी खत्म हो गया. 4 मई 2026 का दिन भारतीय राजनीतिक इतिहास में वामपंथ के एक युग के अंत के रूप में दर्ज हो गया. पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा के बाद अब केरल में भी लाल झंडा सत्ता से बाहर हो गया है.

कभी राष्ट्रीय राजनीति में थी निर्णायक भूमिका

केरल में कम्युनिस्टों की हार सिर्फ एक राज्य का नतीजा नहीं है, बल्कि यह भारत की राजनीति में लगातार सिमटते वामपंथ के प्रभाव की साफ तस्वीर है. एक समय था जब कॉमरेड हरकिशन सिंह सुरजीत, ए बी वर्धन, विनोद मिश्रा सरीखे नेताओं के कुशल नेतृत्व में पश्चिम बंगाल, केरल, त्रिपुरा जैसे राज्यों में वामपंथ की सरकारें और दबदबा हुआ करता था.

2004 के लोकसभा चुनाव में 62 सांसदों के साथ वामपंथ का यूपीए सरकार पर गहरा प्रभाव साफ दिखाई देता था. मनमोहन सिंह सरकार को बाहर से समर्थन देने वाला वाम मोर्चा नीतिगत फैसलों में अहम भूमिका निभाता था. लेकिन आज परिस्थिति पूरी तरह से बदल चुकी है. 2011 में पश्चिम बंगाल, 2018 में त्रिपुरा और अब 2026 में केरल हारने के बाद वामपंथ किसी भी राज्य की सत्ता में नहीं है.

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जमीनी कैडर अब भी सक्रिय, लेकिन चुनावी चुनौती गहराई

भाकपा, माकपा और भाकपा माले जैसी पार्टियां अभी भी बुनियादी सवालों को लेकर आंदोलनात्मक एवं संगठनात्मक रूप से सक्रिय हैं. समर्पित, जमीनी एवं त्यागी कैडर भी इनके पास मौजूद है. लेकिन चुनावी राजनीति में लगातार घटता जनाधार वामपंथ के लिए बड़ी चुनौती बन गया है.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बदली हुई सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों, नई पीढ़ी से संवाद की कमी और राष्ट्रीय विमर्श में खुद को प्रासंगिक न रख पाना वामपंथ के पतन के बड़े कारण रहे. 1957 में केरल में ईएमएस नम्बूदिरिपाद के नेतृत्व में दुनिया की पहली लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई कम्युनिस्ट सरकार बनी थी. 69 साल बाद उसी केरल में वामपंथ का सत्ता से बाहर होना एक ऐतिहासिक मोड़ माना जा रहा है.

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