Hazaribagh: मातृ दिवस पर जहां पूरी दुनिया मां के प्रेम का उत्सव मना रही है, वहीं समाज के बीच एक ऐसा वर्ग भी है जिसकी ममता हर दिन कयामत से लड़ती है. हजारीबाग लोकसभा क्षेत्र के सैकड़ों बच्चे हीमोफिलिया और थैलेसीमिया जैसी बीमारियों की जद में हैं, लेकिन इन बच्चों और मौत के बीच अगर कोई मजबूत दीवार खड़ी है, तो वो है इनकी मां.
कांच के महल जैसी सुरक्षा और मां का पहरा
हीमोफिलिया से ग्रसित बच्चे की मां का जीवन किसी कांच के महल की रक्षा करने जैसा है. एक सामान्य बच्चे के लिए गिरना-चोट लगना मामूली बात है, लेकिन इन माताओं के लिए एक खरोंच भी संकट बन जाती है. आंतरिक रक्तस्राव के कारण जब बच्चा तड़पता है, तब मां अपने आंसुओं को जब्त कर खुद बच्चे की नसों में इंजेक्शन (फैक्टर) लगाना सीख जाती है. अपने ही कलेजे के टुकड़े को बार-बार सुई चुभाना किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं.

ब्लड बैंक ही बन गया है दूसरा घर
थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों की माताओं के लिए हजारीबाग मेडिकल कॉलेज का ब्लड बैंक ही दूसरा घर बन गया है. सुदूर गांवों से गोद में बच्चा लिए तपती धूप और मूसलाधार बारिश की परवाह किए बिना ये माताएं समय पर खून की व्यवस्था करने पहुंचती हैं. कई बार व्यवस्था की खामियां और सामाजिक ताने इनके हौसले को तोड़ने की कोशिश करते हैं, लेकिन मातृत्व की शक्ति कभी हार नहीं मानती.
सांसद की संवेदनशीलता और पहल
इन संघर्षशील माताओं के दर्द को समझते हुए सांसद मनीष जायसवाल ने विधायक कार्यकाल से ही इनकी आवाज उठाई है. आज हजारीबाग में डे केयर यूनिट की स्थापना और ब्लड सेपरेशन जैसी सुविधाओं के लिए हो रहे प्रयास इन्हीं माताओं के आंसुओं को पोंछने की एक कोशिश है. हाल ही में सांसद ने इन परिवारों से मिलकर उन्हें हर संभव सहायता और राहत पहुंचाने का भरोसा भी दिलाया है.
रक्तदाता: उम्मीदों के फरिश्ते
इस कठिन संघर्ष में समाज के स्वैच्छिक रक्तदाता इन माताओं के लिए किसी फरिश्ते से कम नहीं हैं. एक पुकार पर रक्त देकर वे उस मां की उम्मीदों को जिंदा रखते हैं जो अपने बच्चे की एक-एक सांस के लिए जद्दोजहद कर रही है.
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