हाजिरी की ‘मलाई’ और खाली क्लासरूम की ‘दुहाई’, विष्णुगढ़ के इस कॉलेज में कब रुकेगा अनुदान का यह काला खेल?

Hazaribagh: एक तरफ सरकार शिक्षा को बेहतर बनाने के लिए करोड़ों का बजट पास करती है, तो दूसरी तरफ हकीकत की जमीन...

Hazaribagh: एक तरफ सरकार शिक्षा को बेहतर बनाने के लिए करोड़ों का बजट पास करती है, तो दूसरी तरफ हकीकत की जमीन पर ये सपने दम तोड़ रहे हैं. विष्णुगढ़ इंटर महाविद्यालय इन दिनों शिक्षा का मंदिर कम और ‘कागजी बाजीगरी’ का अड्डा ज्यादा लग रहा है. यहाँ का सन्नाटा बहुत कुछ चीख-चीख कर कह रहा है.

हाजिरी का वो जादुईखेल

कॉलेज के गलियारों में सन्नाटा पसरा रहता है, बेंच धूल फांक रहे हैं, लेकिन जब रजिस्टर खुलते हैं, तो मानों छात्रों की फौज उमड़ पड़ती है. आरोप है कि यह सब कुछ एक सोची-समझी साजिश के तहत हो रहा है. दरअसल, सरकारी अनुदान पाने के लिए ‘न्यूनतम उपस्थिति’ अनिवार्य है. बस, इसी सरकारी खजाने को डकारने के लिए खाली क्लासरूम के बीच भी हाजिरी का रजिस्टर डेली भर दिया जाता है. ग्रामीण छात्रों के लिए यह कॉलेज अब पढ़ाई का केंद्र नहीं, बल्कि सिर्फ एडमिट कार्ड और फॉर्म भरने का स्टॉपेज बनकर रह गया है.

ड्यूटी से डंडीमार कोचिंग में पसीना बहाते गुरुजी

कहानी यहीं खत्म नहीं होती, जहां शिक्षकों को ब्लैकबोर्ड पर चौक चलानी चाहिए, वहां वे निजी कोचिंग में ‘प्रोफेशनल’ बने बैठे हैं. प्रो. प्रदीप यादव का मामला तो चौंकाने वाला है. जब उन्हें कॉलेज में क्लास लेनी चाहिए थी, तब वे विष्णुगढ़-गोमिया मुख्य मार्ग स्थित अपने निजी कोचिंग ‘साइंस सेंटर’ में छात्रों को पढ़ाते पाए गए. हैरानी की बात यह है कि जब उनसे इस पर सवाल हुआ, तो उन्होंने बड़ी बेबाकी से कह दिया— “अभी नामांकन चल रहा है, इसलिए देर से जाते हैं”. क्या सरकारी सैलरी सिर्फ ‘नामांकन’ के बाद ड्यूटी शुरू करने के लिए मिलती है?

गरीब बच्चों के सपनों पर कोचिंगका ग्रहण: स्वर्गीय टेकलाल महतो के सपनों वाले कॉलेज की बदहाली का कड़वा सच

समाज का बड़ा नुकसान

स्वर्गीय टेकलाल महतो जैसे जननेताओं ने जिस सपने के साथ इस कॉलेज की नींव रखी थी, उसे आज निजी स्वार्थों की भेंट चढ़ाया जा रहा है. गरीब और ग्रामीण परिवारों के बच्चे, जो बेहतर भविष्य के सपने लेकर यहाँ आते हैं, उनके हाथ में शिक्षा नहीं, बल्कि सिर्फ कागजी औपचारिकताओं का झुनझुना थमा दिया गया है. ​अब सवाल यह है कि शिक्षा विभाग की कुंभकर्णी नींद कब खुलेगी? क्या जिम्मेदार अधिकारी इन ‘कागजी स्कूलों’ पर नकेल कसेंगे या फिर अनुदान का यह खेल यूँ ही चलता रहेगा?

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