रिपोर्ट : आयुष चौहान
Ranchi: राज्य में हिरासत में होने वाली मौतों के मामले में झारखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने सरकार की कार्य प्रणाली पर बेहद सख्त टिप्पणी की है, मुख्य न्यायाधीश एस एम सोनक एवं न्यायाधीश राजेश शंकर की खंडपीठ ने हिरासत में हुई मौतों की संख्या और उसकी जांच नहीं होने पर इसे संवैधानिक तंत्र की विफलता बताते हुए जमकर फटकार लगाई है.

427 में से 262 मामलों की जांच पर सवाल
अदालत में कहा कि सरकार ने कानून का उल्लंघन कर 427 में से 262 मामलों की जांच मजिस्ट्रेट के बजाय कार्यकारी मजिस्ट्रेट से कराया है अदालत ने कहा कि चौंकाने वाली बात यह है कि जांच उन अधिकारियों के द्वारा की गई जिनके पास इसका कानूनी अधिकार था ही नहीं, ऐसे में उनके जांच के आधार, मानक एवं रिपोर्ट वैध नहीं हो सकते. वहीं अदालत ने सख्त निर्देश जारी किया है अदालत में कहा है कि राज्य में CrPC 176(1-अ) और नए कानून 196(2) के तहत हिरासत या जेल में मौत, गायब होने या बलात्कार जैसे मामलों की जांच अनिवार्य रूप से केवल न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा ही कराना होगा.
‘जिन्हें अधिकार नहीं, उनसे कराई गई जांच’
अदालत ने कहा कि कार्यकारी मजिस्ट्रेट जैसे एसडीएम या एडीएम की जांच को इसका विकल्प नहीं माना जा सकता, इधर अदालत में पुराने मामलों की फिर से जांच करने का दिशा निर्देश जारी किया है अदालत ने राज्य सरकार के इनकार के रवैया को खारिज करते हुए कई दिशा निर्देश जारी किए अदालत ने कहा कि 2018 के बाद से जिन 262 मामलों की जांच कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने की थी उन सभी की नए सिरे से न्यायिक जांच होगी इसके लिए जिला जजों को 15 दिनों के भीतर मजिस्ट्रेट नामित करने होंगे, अदालत ने लापरवाही पर भी सख्त रवैया अपनाया है अदालत में गृह सचिव और प्रधान जिला जजों से 6 माह के भीतर लापरवाही पर रिपोर्ट मांगी है पूछा है कि आखिर कानून का उल्लंघन कर जांच क्यों ऐसे लोगों को दी गई जिन्हें उसका अधिकार था ही नहीं अदालत ने उन अधिकारियों की पहचान करने और उन पर कार्रवाई करने की दिशा निर्देश दिए हैं.
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एसडीएम-एडीएम की जांच नहीं होगी मान्य
इस पर गृह सचिव को मामले में लोगों को चिन्हित कर उन पर कार्रवाई कर अदालत को रिपोर्ट सौंपनी होगी, वहीं अदालत ने अब से होने वाले हिरासत में किसी भी अनहोनी घटना पर विशेष रूप से निर्देशित किया है कि किसी भी घटना और अनहोनी होने पर 24 घंटे के अंदर इसकी जानकारी मानवअधिकार आयोग (NHRC) और जिला जज को देना अनिवार्य किया है.
डीएम और एसपी को सर्कुलर जारी करने का आदेश
अदालत में सख्त रूप से मुख्य नियुक्त सचिव को निर्देश दिया है कि सभी डीएम और सपा को सर्कुलर जारी कर बताएं कि भविष्य में ऐसी किसी भी लापरवाही को कानून का जानबूझकर उल्लंघन माना जाएगा क्योंकि पुलिस और प्रशासन अलग अलग भेष में एक ही है और शायद इसलिए संसद ने यह शक्ति कार्यपालिका से छीनकर न्यायपालिका को दी थी ताकि पुलिस और प्रशासन के बीच भाईचारे के रिश्तों के कारण जांच प्रभावित न हो, न्यायपालिका अपने कर्तव्यों का निर्माण बेहतर से करें यह भी जरूरी है अदालत में सर्वोच्च न्यायालय के नीलावती बेहरा केस का जिक्र करते हुए कहा कि हिरासत में मौजूद व्यक्ति की जीवन की रक्षा करना राज्य की सख्त जिम्मेदारी है जिसमें कोई बहाना नहीं नहीं चलेगा, मामले में झारखंड न्याय का अकादमी को 4 महीने के भीतर एक मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) बनाने को कहा है ताकि नियमों के तहत जांच में कोई बाधा ना आ सके प्रक्रियाओं का पालन सही तरीके से हो.
