सुविधाओं के बीच पानी को तरसता शहर: खतियानी परिवार की बैठक में गूँजा हज़ारीबाग के ऐतिहासिक तालाबों की बदहाली का दर्द

Hazaribagh: पुराना धरना स्थल के समीप शनिवार को खतियानी परिवार की एक महत्वपूर्ण साप्ताहिक बैठक अशोक राम की अध्यक्षता में संपन्न हुई....

Hazaribagh: पुराना धरना स्थल के समीप शनिवार को खतियानी परिवार की एक महत्वपूर्ण साप्ताहिक बैठक अशोक राम की अध्यक्षता में संपन्न हुई. इस बैठक में हज़ारीबाग शहर के ऐतिहासिक जल स्रोतों के संरक्षण और वर्तमान जल संकट को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की गई. बैठक का संचालन और मुख्य वक्तव्य झारखंड आंदोलनकारी सह खतियानी परिवार के वरिष्ठ सदस्य रामावतार भगत ने रखा.

कुदरत ने दिए 50 तालाब और दर्जनों कुएं, फिर भी पानी के लिए रो रही जनता

बैठक को संबोधित करते हुए वरिष्ठ सदस्य रामावतार भगत ने कहा कि हज़ारीबाग में प्राकृतिक रूप से पानी की कोई किल्लत नहीं है. इस शहर को प्रकृति ने छड़वा डैम, झील, दर्जनों कुएं और लगभग 50 तालाब दिए हैं, लेकिन देखरेख के अभाव में आज दर्जनों ऐतिहासिक कुएं पूरी तरह लुप्त हो चुके हैं. उन्होंने कहा कि आज जनता पानी-पानी के लिए रो रही है, जबकि इसके जिम्मेदार हम खुद हैं.

अंग्रेजों के ज़माने में ‘मीठा तालाब’ से चलती थी 200 परिवारों की रोजी-रोटी

भगत जी ने हज़ारीबाग के इतिहास का एक बेहद दिलचस्प और भावुक पहलू साझा किया. उन्होंने बताया, “अंग्रेजों के राज में हज़ारीबाग शहर को दो ऐतिहासिक तालाब मिले थे– पेठिया टांड और बुढ़वा महादेव, जो अपने शुद्ध पानी के कारण ‘मीठा तालाब’ के नाम से मशहूर हुए. उस ज़माने में लगभग 200 भार वाले (पानी ढोने वाले) मात्र दो आने प्रति भार लेकर घर-घर पानी पहुँचाते थे और इसी से उनकी नमक-रोटी चलती थी. सुदूर गांवों से आने वाले राहगीर इसी मीठा तालाब के किनारे बैठकर सत्तू-शरबत खाते थे और पानी पीते थे.”

सिपाही देते थे पहरा, आज़ादी के बाद दोनों तालाब हुए ‘लावारिस’

तालाबों की सुरक्षा का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि ब्रिटिश शासन काल में इन दोनों तालाबों की देखरेख नगरपालिका के दो-दो कर्मचारी और सदर थाना के एक-एक सिपाही करते थे. पहरेदारी ऐसी थी कि कोई तालाब के पानी में पैर तक नहीं डुबा सकता था. लेकिन आज़ादी के बाद जैसे ही इसकी कमान जिला प्रशासन और नगरपालिका के जिम्मे आई, दोनों विभागों ने अपने कर्तव्य से मुंह मोड़ लिया.

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जनता ने खुद मारी अपने पैर पर कुल्हाड़ी, पानी का रंग हुआ नीला-पीला

रामावतार भगत ने कड़े शब्दों में कहा कि प्रशासन की लापरवाही के साथ-साथ जनता भी इस बर्बादी की बराबर की जिम्मेदार है. लोगों ने इन ऐतिहासिक तालाबों को लावारिस समझकर गंदा करना शुरू कर दिया.

कहीं कपड़े धोए जाने लगे तो कहीं मवेशियों को नहलाया जाने लगा. चारों तरफ गंदगी फेंकने से आज इन मीठे तालाबों का पानी पूरी तरह सड़ चुका है और इसका रंग नीला-पीला हो गया है, जो अब पीने लायक तो दूर, छूने लायक भी नहीं बचा.

नियमों की अनदेखी बनी तबाही का कारण

उन्होंने याद दिलाया कि अंग्रेजों के समय व्यवस्था बिल्कुल साफ थी– मूर्ति विसर्जन के लिए केवल ‘छठ तालाब’ को चिन्हित किया गया था और कपड़े धोने के लिए ‘धोबिया तालाब’ तय था. लेकिन जनता ने सभी नियमों को ताक पर रख दिया और आज नतीजा सबके सामने है.

बैठक में ये रहे उपस्थित

खतियानी परिवार की इस आवश्यक बैठक में मुख्य रूप से महेश विश्वकर्मा, मेघन मेहता, सुरेश महतो, मोहम्मद आशिक, प्रदीप प्रसाद मेहता, मोहम्मद फखरुद्दीन, बोधी साव, मोहम्मद मुस्तकीम, विजय मिश्रा, कुंदन राव, हंजला हाशमी, असलम खान, मोहम्मद उस्मान, बालेश्वर कुमार दास, शंकर राम सहित कई अन्य सदस्य उपस्थित थे.

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