News Wave Desk : भारत ने सिंधु जल संधि को लेकर कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन के फैसले को खारिज कर दिया है. मामला भारत पाकिस्तान के बीच हुए सिंधू जल संधि से संबधित है. विदेश मंत्रालय की ओर से जारी बयान में कहा गया कि अदालत अवैध तरीके से गठित की गई है. इसका कोई कानूनी अस्तित्व नहीं है. इसलिए इसके किसी भी फैसले, आदेश या कार्रवाई को भारत मान्यता नहीं देता. विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि अवैध रूप से गठित तथाकथित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने सिंधु जल संधि के तहत अधिकतम जल भंडारण क्षमता से जुड़े मामले में फैसला जारी किया है.
जायसवाल ने कहा कि भारत इस फैसले को पूरी तरह खारिज करता है. जैसे पहले दिए गए सभी फैसलों को खारिज किया गया था. भारत ने कभी भी इस अदालत के गठन को मान्यता नहीं दी. ऐसे में इस अदालत की किसी भी कार्यवाही, फैसले या आदेश का कोई कानूनी महत्व नहीं है और वह पूरी तरह नल एंड वॉयड यानी शून्य और अमान्य है.

मंत्रालय ने साफ किया कि जल संधि स्थगित रखने का फैसला अब भी लागू है. दोनों देशों के बीच 19 सितंबर 1960 को सिंधु नदी प्रणाली के जल उपयोग को लेकर यह संधि हुई थी. भारत ने पिछले साल पहलगाम आतंकी हमले के बाद अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अपने संप्रभु अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए इस संधि को स्थगित कर दिया था. भारत का कहना था कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को विश्वसनीय और स्थायी रूप से समर्थन देना बंद नहीं करता, तब तक संधि स्थगित रहेगी.
इसके पहले, विदेश मंत्रालय ने जून 2025 में भी स्पष्ट कहा था कि जब तक संधि स्थगित है, तब तक भारत इस समझौते के तहत किसी भी दायित्व को निभाने के लिए बाध्य नहीं है. भारत ने कहा कि कोई भी कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन, खासकर ऐसा अवैध रूप से गठित निकाय, भारत के संप्रभु अधिकारों के तहत उठाए गए कदमों की वैधता पर सवाल नहीं उठा सकता.
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