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शुभेंदु और हिमंता के राह पर चंपाई, धर्म विशेष को झारखंड में कर रहे टारगेट, इस बार शिल्पी नेहा तिर्की निशाने पर

Ranchi: हाल ही में देश के पांच राज्यों में चुनाव हुए. इन पांच राज्यों में दो राज्य असम और पश्चिम बंगाल में...

Ranchi: हाल ही में देश के पांच राज्यों में चुनाव हुए. इन पांच राज्यों में दो राज्य असम और पश्चिम बंगाल में जिस तरीके से बीजेपी ने जीत दर्ज की है, वो चर्चा का विषय बना हुआ है. राजनीति के जानकार कहते हैं कि दोनों ही राज्यों में बीजेपी ने हिंदू और मुस्लिम कार्ड बड़ी ही चालाकी से खेला, जिससे पार्टी को प्रचंड जीत मिली. अब झारखंड में भी बीजेपी उसी राह पर चलती नजर आ रही है. यहां भी पूर्व मुख्यमंत्री और मौजूदा विधायक चंपाई सोरेन एक धर्म विशेष को टारगेट कर रहे हैं. फिलहाल उनके सोशल मीडिया पोस्ट को देख कर तो ऐसा ही लग रहा है. दरअसल चंपाई सोरेन ने एक्स हैंडल पर एक पोस्ट डाला है. पोस्ट में वो राज्य की कृषि पशुपालन मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की को टारगेट कर रहे हैं. शिल्पी नेहा तिर्की ईसाई समाज से आती हैं. हालांकि चंपाई सोरेन ने मंत्री का नाम नहीं लिखा है. 

क्या कहा चंपाई सोरेन ने

झारखंड हाई कोर्ट में एक समाजसेवी ने जनहित याचिका दायर कर एक मंत्री के जाति प्रमाण पत्र पर गंभीर सवाल उठाया है. उक्त याचिका में कहा गया है कि उक्त जाति प्रमाण पत्र के एफिडेविट में धर्म के स्थान पर ईसाई लिखा गया है. जब ईसाई धर्म में कोई जाति व्यवस्था नहीं होती, तो फिर उन्हें अनुसूचित जनजाति का प्रमाण पत्र कैसे मिला? इसी साल 24 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि “ईसाई धर्म में जाति व्यवस्था नहीं होती. इसलिए अगर कोई व्यक्ति हिंदू (या सिख/बौद्ध) से ईसाई बन जाता है और सक्रिय रूप से ईसाई धर्म का पालन/प्रचार करता है, तो वह अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जा सकता.” इस से पहले 27 नवम्बर 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि धर्म परिवर्तन के बाद भी आरक्षण समेत अन्य अधिकार लेने की कोशिश वास्तव में “संविधान के साथ धोखाधड़ी” है. यह भारतीय संविधान की मूल भावना के खिलाफ है. 

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आदिवासी अधिकारों और पहचान पर टिप्पणी 

आगे उन्होंने लिखा है कि लेकिन फिर भी, यहां धर्मांतरित लोग आदिवासियों के लिए आरक्षित विधानसभा/ लोकसभा सीटों पर ना सिर्फ चुने जा रहे हैं, बल्कि नौकरियों में अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित अधिकतर सीटों पर भी कब्जा कर रहे हैं. उन्हें कई स्कूल मुफ्त शिक्षा देते हैं, जबकि आदिवासी समाज के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ कर, काफी पीछे रह जाते हैं. दुनिया में कई आदिवासी समुदायों में ईसाई धर्मांतरण के बाद पारंपरिक रीति-रिवाज, त्योहार, भाषा, नृत्य, पूजा-पाठ और सामाजिक संरचनाएं काफी हद तक भुला दी गईं या छोड़ दी गईं. यह प्रक्रिया मिशनरियों के प्रभाव और सामाजिक दबाव से हुई. लैटिन अमेरिका की अयोरेओ जनजाति, केन्या की संबुरु जनजाति, ब्राजील की वाई वाई जनजाति, फिजी और पैसिफिक आइलैंड्स की जनजातियां धर्मांतरण के बाद अपनी मूल संस्कृति को लगभग भूल चुकी हैं. 

संस्कृति और परंपरा पर बहस 

पोस्ट में आगे लिखा गया है कि लेकिन हमारे यहां धर्मांतरण करने वाले लोग स्वयं को श्रेष्ठ मानने लगते हैं. हम पेड़ के नीचे बैठ कर पूजा करने वाले लोग हैं. बच्चे के जन्म से लेकर, शादी-विवाह एवं मृत्यु तक, आदिवासी समाज की अपनी स्पष्ट जीवनशैली है, हमारी अपनी पूजा पद्धति है, और इसे छोड़ने वाले कुछ भी बनें, लेकिन आदिवासी नहीं हो सकते. जब आप अपनी रूढ़िजन्य परंपराओं, प्रथाओं, कला-संस्कृति एवं पहचान को छोड़ कर धर्म परिवर्तन करते हैं, तो फिर आपको हमारे समाज को मिले अधिकारों में अतिक्रमण का भी कोई अधिकार नहीं है. जब कोई अपना धर्म बदल लेता है, हमारी परंपराओं से मुंह मोड़ लेता है, एक अलग जीवनशैली अपना लेता है, तो वह खुशी से नए धर्म के साथ रहे, लेकिन भारतीय संविधान द्वारा हमारे समाज को दिए गए अधिकारों को छीनने का प्रयास मत करे. भारत में कुछ लोग भोले-भाले आदिवासियों को गुमराह कर/ लालच देकर/ डरा कर, तो कभी मजबूरी का फायदा उठा कर उनका धर्मांतरण कर रहे हैं. इन्हें रोकना जरूरी है. डीलिस्टिंग की प्रक्रिया द्वारा अथवा अनुच्छेद 342 में जरूरी बदलाव कर केन्द्र सरकार को आदिवासियों के अस्तित्व पर आए इस संकट का समाधान करना चाहिए. अगर इस धर्मांतरण को नहीं रोका गया तो भविष्य में हमारे सरना स्थलों, जाहेरस्थानों एवं देशाउली में कौन पूजा करेगा? फिर हमारा अस्तित्व कैसे बचेगा?

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