Newsdesk : झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले में जादूगोड़ा के पास स्थित रंकिनी मंदिर राज्य के सबसे प्राचीन और आस्था से जुड़े मंदिरों में गिना जाता है. यह मंदिर पोटका प्रखंड के बंसिला ग्राम पंचायत अंतर्गत रोहिणीबेरा गांव में कपड़गड़ी घाट क्षेत्र में स्थित है. हाटा-जादूगोड़ा मार्ग के निकट स्थित इस मंदिर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचकर माता रंकिनी की पूजा-अर्चना करते हैं. स्थानीय मान्यता के अनुसार यहां स्थापित पत्थर की शिला माता रंकिनी का साक्षात स्वरूप मानी जाती है.


घने जंगलों के बीच आस्था का केंद्र है मंदिर

कहा जाता है कि प्राचीन समय में जब यह इलाका घने जंगलों से घिरा हुआ था, तब इस मार्ग से गुजरने वाले लोग अपनी सुरक्षा और कुशलता के लिए माता रंकिनी की पूजा करते थे. लोगों की मान्यता है कि माता अपने भक्तों की रक्षा करती थीं और कठिन परिस्थितियों में उनकी सहायता करती थीं. यही वजह है कि यह मंदिर धीरे-धीरे क्षेत्र की आस्था का प्रमुख केंद्र बन गया.
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सपने में मिला मंदिर स्थापना का संकेत

मंदिर के इतिहास से जुड़ी एक प्रसिद्ध मान्यता के अनुसार देवी रंकिनी ने दीनबंधु सिंह नामक व्यक्ति को सपने में दर्शन दिए थे. उन्होंने बताया था कि वह पत्थर के रूप में कपड़गड़ी घाटी में विराजमान हैं और पूजा चाहती हैं. इसके बाद दीनबंधु सिंह ने उस पत्थर की पूजा शुरू की. कुछ समय बाद देवी ने फिर स्वप्न में प्रकट होकर ऐसा स्थान बनाने को कहा, जहां आम लोग भी पहुंचकर पूजा कर सकें. रंकिनी मंदिर की स्थापना 1947-50 के दौरान हुई थी, इसके बाद वर्तमान मंदिर की स्थापना की गई.
हर साल बढ़ रहा है माता की शिला का आकार

मंदिर से जुड़ी एक और विशेष मान्यता यह है कि यहां माता के रूप में पूजी जाने वाली पत्थर की शिला का आकार धीरे-धीरे बढ़ रहा है. श्रद्धालु इसे माता की जीवंत उपस्थिति और दिव्य शक्ति का प्रमाण मानते हैं. वर्तमान में मंदिर का संचालन दीनबंधु सिंह के परिवार और ट्रस्ट द्वारा किया जाता है.
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लोककथाओं में भी मिलता है माता रंकिनी का उल्लेख

रंकिनी मंदिर से जुड़ी कई लोककथाएं भी प्रचलित हैं. कहा जाता है कि एक बार जंगल में घूम रही एक रहस्यमयी लड़की चरवाहे से बचने के लिए एक धोबी के कपड़ों के ढेर में छिप गई थी, जो बाद में पत्थर में बदल गया. लोगों का मानना है कि वही माता रंकिनी का स्वरूप था. प्रसिद्ध बंगाली लेखक बिभूतिभूषण बंद्योपाध्याय ने भी अपनी कहानी “रंकिनी देबीर खड्ग” में इस मंदिर और देवी का उल्लेख किया है.
आदिवासी परंपरा और हिंदू आस्था का संगम

कहा जाता है कि यह प्राचीन मंदिर पहले एक चट्टान पर स्थापित था. किंवदंतियों के अनुसार, मंदिर में अतीत में नरबलि (मानव बलि) होती थी, जो लगभग 1865 तक जारी रही, जब अंग्रेजों ने इसे बंद कर दिया. जनजातियों में यह मान्यता थी कि देवी स्वयं पीड़ितों को मार डालती थीं. माना जाता है कि प्रारंभिक समय में इस मंदिर में पूजा भूमिज आदिवासी समुदाय के पुजारी करते थे और आज भी इस परंपरा को निभाया जा रहा है. समय के साथ यह मंदिर आदिवासी और हिंदू आस्था का साझा केंद्र बन गया. यहां माता रंकिनी को देवी काली और दुर्गा का स्वरूप मानकर पूजा जाता है. मंदिर परिसर में भगवान गणेश और भगवान शिव के मंदिर भी स्थित हैं.
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