Saraikela: चांडिल डैम बहुउद्देशीय परियोजना से विस्थापित हुए परिवारों का आक्रोश एक बार फिर खुलकर सामने आया है. चांडिल डैम विस्थापित संघर्ष समिति ने सिंचाई विभाग एवं पुनर्वास कार्यालयों पर वर्षों से विस्थापितों के साथ छल, धोखाधड़ी, सौतेला व्यवहार और भ्रष्टाचार करने का गंभीर आरोप लगाया है.

40 साल बाद भी हक से वंचित
समिति के सचिव विवेक सिंह बाबू ने कहा कि सुवर्णरेखा बहुउद्देशीय परियोजना के तहत 84 मौजा और 116 गांवों की रैयती जमीन विकास के नाम पर अधिग्रहित की गई, लेकिन आज तक हजारों विस्थापित अपने हक और अधिकार से वंचित हैं. समिति का आरोप है कि डैम निर्माण काल से ही पुनर्वास कार्यालय संख्या-1 आदित्यपुर तथा पुनर्वास कार्यालय संख्या-2 चांडिल में विस्थापितों को गुमराह कर उनका आर्थिक और मानसिक शोषण किया गया. जमीन, मकान, जायदाद के मुआवजा भुगतान से लेकर पुनर्वास स्थल, पुनर्वास अनुदान और नौकरी देने तक में भारी धांधली हुई है.
फर्जी विकास पुस्तिका का खेल
विवेक सिंह बाबू ने आरोप लगाया कि पुनर्वास कार्यालय में फर्जी विकास पुस्तिका बनाकर वास्तविक विस्थापितों को दरकिनार कर दलालों और प्रभावशाली लोगों को लाभ पहुंचाया गया. कई पात्र परिवारों को आज तक प्लॉट आवंटित नहीं हुआ, जबकि बाहरी लोगों के नाम पर पुनर्वास कॉलोनी में मकान बन गए. अनुदान की राशि भी बिना सत्यापन के फर्जी लोगों को बांट दी गई. नौकरी में भी स्थानीय विस्थापित युवाओं की जगह पैसे लेकर बाहरी लोगों को नियुक्त किया गया.
77 वर्षीय महिला ने दी चेतावनी
ईचागढ़ के रसनचांदपुर गांव से विस्थापित 77 वर्षीय मालती देवी ने कहा, कि “40 साल से कार्यालय के चक्कर काट रही हूं. पति की मौत हो गई, बेटा मजदूरी करता है. न प्लॉट मिला, न अनुदान. अब हक नहीं मिला तो पुनर्वास कार्यालय संख्या-2 चांडिल में ही धरने पर बैठूंगी और वहीं प्राण त्याग दूंगी.”
समिति की मांग
चांडिल डैम विस्थापित संघर्ष समिति ने मांग की है कि:
1. पुनर्वास कार्यालयों में हुए भ्रष्टाचार की सीबीआई या उच्चस्तरीय जांच हो.
2. फर्जी विकास पुस्तिका रद्द कर सभी वास्तविक विस्थापितों का नए सिरे से सत्यापन हो.
3. छूटे हुए सभी पात्र परिवारों को अविलंब प्लॉट, अनुदान और नियमानुसार नौकरी दी जाए.
4. पुनर्वास कॉलोनियों में मूलभूत सुविधा जैसे सड़क, बिजली, पानी, स्कूल उपलब्ध कराई जाए.
समिति ने चेतावनी दी है कि यदि 15 दिनों के भीतर मांगें नहीं मानी गईं, तो चांडिल डैम के सभी विस्थापित पुनर्वास कार्यालयों के समक्ष अनिश्चितकालीन धरना-प्रदर्शन और आमरण अनशन शुरू करेंगे. इसकी पूरी जिम्मेदारी जिला प्रशासन और जल संसाधन विभाग की होगी. बता दें मुआवजा भुगतान से लेकर पुनर्वास स्थल, पुनर्वास अनुदान और नौकरी देने तक में भारी धांधली हुई. कई विस्थापित अपने अधिकार की आस में जिंदगी गंवा बैठे, जबकि आज भी सैकड़ों परिवार न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं.
“विकास के नाम पर छीनी गई जमीन”
समिति ने कहा कि 30 अप्रैल 1978 को डैम आंदोलन के दौरान हुए जोयदा गोलीकांड में शहीद हुए चौका आदरडीह गांव के पहाड़ू महतो और गंगाधर महतो इस संघर्ष के जीवंत प्रतीक हैं. आरोप लगाया गया कि किसानों और ग्रामीणों की जमीन बलपूर्वक और दबाव बनाकर ली गई. पुनर्वास नीति में प्रत्येक विस्थापित परिवार को नौकरी, बसावट और मूलभूत सुविधाएं देने का वादा किया गया था, लेकिन अधिकांश लोगों को आज तक पूरा लाभ नहीं मिला.
विस्थापितों का कहना है कि वर्ष 1979 से सर्वेक्षण और विकास पुस्तिका बनाने की प्रक्रिया शुरू हुई थी. बाद में अचानक विस्थापित कार्ड बनना बंद कर दिया गया. जब भी ग्रामीण पुनर्वास कार्यालय पहुंचते थे, कर्मचारियों द्वारा यह कहकर वापस लौटा दिया जाता था कि “विकास पुस्तिका अभी नहीं बन रही है.”
दलालों और कर्मचारियों की मिलीभगत का आरोप
समिति के अनुसार वर्ष 2018 से गांव-गांव में एजेंट और दलाल सक्रिय किए गए. इन्होंने भोले-भाले विस्थापितों से विकास पुस्तिका, प्लॉट और नौकरी दिलाने के नाम पर मोटी रकम वसूली. पुनर्वास कार्यालय के कुछ कर्मचारियों की मिलीभगत से फर्जी दस्तावेज तैयार कर अपात्र लोगों को लाभ पहुंचाया गया.
“एक परिवार, एक नौकरी का वादा झूठा”
संघर्ष समिति के सदस्य शंकर महतो ने बताया कि पुनर्वास नीति के तहत “एक परिवार, एक नौकरी” का प्रावधान था. लेकिन चांडिल और आदित्यपुर कार्यालय में रिश्वत लेकर बाहरी लोगों को नौकरी दी गई. असली विस्थापित युवा आज भी बेरोजगार घूम रहे हैं. RTI से मिली जानकारी में भी भारी अनियमितता सामने आई है.
जमीन है पर अधिकार नहीं
तिरुलडीह के विस्थापित सुधीर सिंह मुंडा ने कहा, “पुनर्वास कॉलोनी में हमें जो प्लॉट दिखाया गया, उस पर पहले से ही दूसरे का कब्जा है. कार्यालय वाले नक्शा बदल देते हैं. 45 साल हो गए, तीन पीढ़ी खप गई पर हक नहीं मिला.”
आंदोलन की चेतावनी
समिति ने जल संसाधन विभाग और जिला प्रशासन को 7 सूत्री मांगपत्र सौंपा है. चेतावनी दी गई है कि यदि 10 जून 2026 तक उच्चस्तरीय जांच कमेटी गठित कर कार्रवाई शुरू नहीं हुई, तो चांडिल डैम के हजारों विस्थापित परिवार पुनर्वास कार्यालय संख्या-1 आदित्यपुर और संख्या-2 चांडिल का घेराव कर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू करेंगे. शहीदों के खून से बनी इस परियोजना में विस्थापितों के साथ अन्याय बर्दाश्त नहीं होगा. “जमीन हमारी, हक हमारा” के नारे के साथ आर-पार की लड़ाई लड़ी जाएगी.
आधा हिस्सा मांगने का आरोप
ग्रामीणों से सर्वेक्षण पंजी और पुराने दस्तावेज लेकर “विभाजित कार्ड” और “विकास पुस्तिका” बनाने के नाम पर आधा हिस्सा मांगने का आरोप लगाया गया, जो लोग हिस्सेदारी के लिए तैयार हुए, उनके फर्जी दस्तावेज तैयार कर पुस्तिका बनाई गई और अनुदान राशि का बड़ा हिस्सा कथित रूप से कर्मचारियों और दलालों में बांट लिया गया.
आरोप यह भी है कि जिन विस्थापितों ने रिश्वत या हिस्सेदारी देने से इनकार किया, उन्हें आज तक विकास पुस्तिका नहीं दी गई. समिति ने चौका आदरडीह गांव की 77 वर्षीय मालती देवी का उदाहरण देते हुए कहा, कि सही दस्तावेज जमा करने के बावजूद उन्हें वर्षों से न्याय नहीं मिला. मालती देवी के पति भी विस्थापन का दंश झेलते हुए चल बसे, पर परिवार को न प्लॉट मिला न मुआवजा.
आरटीआई में भी नहीं मिल रही जानकारी
विस्थापित संघर्ष समिति ने आरोप लगाया कि पुनर्वास कार्यालयों में वर्षों से फर्जीवाड़ा चलने के कारण अब अधिकारी भी असहज स्थिति में हैं. अपर निर्देशक भू-अर्जन एवं पुनर्वास कार्यालय, आदित्यपुर से मांगी गई आरटीआई जानकारी भी उपलब्ध नहीं कराई जा रही है. समिति का कहना है कि विभाग के पास खुद पूरी सूची उपलब्ध नहीं है, कि अब तक कितनी विकास पुस्तिकाएं बनाई गईं और किन लोगों को लाभ मिला.
“रिकॉर्ड गायब, जवाब गोलमोल”
समिति के सचिव विवेक सिंह बाबू ने कहा, “हमने जब आरटीआई में पूछा कि 1979 से अब तक कुल कितने विस्थापित परिवार चिन्हित हुए, कितनों को प्लॉट, कितनों को नौकरी और कितनों को अनुदान मिला, तो विभाग ने ‘रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं’ कहकर पल्ला झाड़ लिया. इससे साफ है कि बड़े पैमाने पर गड़बड़ी हुई है.”
समिति ने आरोप लगाया कि वर्तमान में पुन: निर्गमन और सत्यापन के नाम पर फिर से वसूली का खेल शुरू हो गया है. दलाल सक्रिय हैं और कह रहे हैं कि “ऊपर तक पैसा पहुंचाना पड़ेगा तभी नाम सूची में आएगा.”
उग्र आंदोलन की तैयारी
चांडिल डैम विस्थापित संघर्ष समिति ने ऐलान किया है कि 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस पर जोयदा शहीद स्थल पर श्रद्धांजलि सभा के बाद “हक मार्च” निकाला जाएगा. इसके बाद 15 जून से पुनर्वास कार्यालय संख्या-1 आदित्यपुर और संख्या-2 चांडिल के समक्ष अनिश्चितकालीन धरना शुरू होगा. समिति ने मुख्यमंत्री, जल संसाधन मंत्री और मुख्य सचिव से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है. मांग की गई है कि पूरे मामले की न्यायिक जांच हो, दोषी अधिकारियों-कर्मचारियों पर एफआईआर दर्ज हो और सभी वास्तविक विस्थापितों को 3 माह के भीतर हक दिया जाए.
“विकास की कीमत हमने अपनी जमीन, घर और पुरखों की कब्र देकर चुकाई है. अब और सब्र नहीं,” समिति के सदस्यों ने कहा. समिति ने आरोप लगाया कि वर्तमान में पुन: निर्गमन समिति के गठन और विधायक की सहमति जैसे मुद्दों को बहाना बनाकर वास्तविक विस्थापितों की फाइलें रोकी जा रही हैं. संघर्ष समिति का दावा है कि असल वजह पूर्व में बने कथित फर्जी दस्तावेज और अनियमितताओं के उजागर होने का डर है.
“अब धरना ही अंतिम रास्ता”
विस्थापित संघर्ष समिति ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में तानाशाही का कोई स्थान नहीं है, लेकिन सिंचाई विभाग का रवैया वर्षों से दमनकारी रहा है. इसी के विरोध में चौका आदरडीह गांव की 77 वर्षीय बुजुर्ग महिला मालती देवी अब पुनर्वास कार्यालय संख्या-2 चांडिल परिसर में धरने पर बैठने जा रही हैं. समिति का कहना है कि जब वर्षों तक गुहार लगाने के बाद भी न्याय नहीं मिला, तब विस्थापितों के पास आंदोलन और धरना ही अंतिम विकल्प बचा है. विस्थापितों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर जल्द कार्रवाई नहीं हुई तो आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जाएगा.
मालती देवी की आपबीती
“सुवर्णरेखा बहुउद्देशीय परियोजना के तहत मेरा जमीन, जायदाद और मकान पूरी तरह जलमग्न हो गया. मैं कुकड़ू प्रखंड अंतर्गत चौका आदरडीह गांव की पूर्ण डूबी विस्थापित हूं. पुनर्वास कार्यालय संख्या-2 चांडिल में 1985 से लगातार आवेदन, सर्वेक्षण पंजी, लगान रसीद और वंशावली सहित सभी दस्तावेज जमा कर चुकी हूं.”
77 वर्षीय मालती देवी ने रोते हुए बताया, कि “पति की मौत हो गई हक की लड़ाई लड़ते-लड़ते. बेटा मजदूरी कर परिवार पाल रहा है. अधिकारी कहते हैं फाइल नहीं मिल रही. दलाल 50 हजार मांगते हैं. अब शरीर में जान नहीं बची. फैसला कर लिया है कि जब तक प्लॉट, अनुदान और बेटे को नौकरी नहीं मिलती, पुनर्वास कार्यालय में ही धरना दूंगी. वहीं प्राण चले जाएं तो जाएं.”
समिति की अंतिम चेतावनी
चांडिल डैम विस्थापित संघर्ष समिति ने जल संसाधन विभाग के सचिव और उपायुक्त सरायकेला-खरसावां को अल्टीमेटम दिया है, कि 10 जून 2026 तक निम्न मांगें पूरी की जाएं:
1. 1979 से अब तक के सभी विस्थापितों की सूची सार्वजनिक की जाए.
2. फर्जी विकास पुस्तिका की न्यायिक जांच कर रद्द किया जाए.
3. मालती देवी सहित सभी छूटे हुए वास्तविक विस्थापितों को 30 दिन में प्लॉट आवंटन, अनुदान भुगतान और आश्रित को नौकरी दी जाए.
4. पुनर्वास कार्यालय संख्या-1 और 2 के दोषी अधिकारियों पर प्राथमिकी दर्ज हो.
समिति के सचिव विवेक सिंह बाबू ने कहा, “जोयदा गोलीकांड के शहीदों ने जमीन दी थी, जान दी थी. उनके वारिस आज भी भटक रहे हैं. अब आर-पार की लड़ाई होगी. 15 जून से चांडिल और आदित्यपुर पुनर्वास कार्यालय पर तालाबंदी कर अनिश्चितकालीन महाधरना होगा. हजारों विस्थापित परिवार सड़क पर उतरेंगे.”
