Hazaribagh: जब आसमान से आग बरस रही हो, पारा रिकॉर्ड तोड़ रहा हो और खुद प्रशासन लोगों को घरों से बाहर न निकलने की हिदायत दे रहा हो, तब हजारीबाग के न्यू बस स्टैंड की तपती सड़क पर एक ऐसा खौफनाक नजारा देखने को मिला जिसे देखकर किसी भी संवेदनशील इंसान की रूह कांप जाए. संत स्टीफेंस विद्यालय प्रबंधन ने अपनी ब्रांडिंग और सस्ती पब्लिसिटी की भूख को शांत करने के लिए मासूम बच्चों को ढाल बना दिया. विद्यालय के संस्थापक स्वर्गीय सी. जे. नंदी की स्मृति के नाम पर आयोजित इस तथाकथित सेवा कार्य की जो तस्वीरें सामने आई हैं, वो सेवा नहीं बल्कि बच्चों की सुरक्षा को ताक पर रखकर खेला गया एक खतरनाक खेल है. अनुशासन और समर्पण के मुलम्मे में लपेटकर इन मासूमों को उस झुलसाने वाली दोपहर में सड़क पर लावारिसों की तरह खड़ा कर दिया गया, जहां बड़े-बड़े लोग दो मिनट खड़े होने से कतराते हैं.

तपती भट्टी में झोंके गए मासूम, जिम्मेदार नदारद
तपती दोपहर की ये तस्वीरें चीख-चीख कर गवाही दे रही हैं कि किस तरह स्कूल का नाम चमकाने के लिए इन बच्चों के हाथों में नींबू पानी के गिलास थमा दिए गए. दोपहर के उस वक्त जब गर्म हवाओं के थपेड़े और लू के थपेड़े जिस्म को झुलसा रहे थे, तब रिक्शा चालकों, मजदूरों और राहगीरों की प्यास बुझाने के नाम पर इन बच्चों को धूप की भट्टी में झोंक दिया गया.
खुद को समाज सेवा का मसीहा साबित करने की इस होड़ में स्कूल प्रबंधन यह साफ भूल गया कि जिन बच्चों को वे ‘मानव सेवा’ का पाठ पढ़ा रहे हैं, उनके खुद के स्वास्थ्य पर इस जानलेवा गर्मी का क्या असर पड़ेगा. पब्लिसिटी के भूखे इस तंत्र ने बच्चों के भीतर संवेदना जगाने के नाम पर उनकी सेहत के साथ सरेआम खिलवाड़ किया, जिसे देखकर जागरूक नागरिकों में भारी आक्रोश है.
कागजी दावों और बयानों की आड़ में छिपी हकीकत
इस पूरे मामले को लेकर विद्यालय की प्राचार्या कल्पना बारा ने जो दलीलें दी हैं, वो इस असंवेदनशीलता को और ज्यादा उजागर करती हैं. उनके बयान के मुताबिक, वे इसे बचपन से ही जिम्मेदारी की भावना विकसित करने का जरिया मानती हैं और उनका दावा है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं बल्कि अच्छा इंसान बनाना भी है. लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या बच्चों को अच्छा इंसान बनाने की फैक्ट्री सिर्फ दोपहर की जानलेवा धूप में ही चलती है? क्या बच्चों की सेहत को खतरे में डाले बिना नैतिक शिक्षा नहीं दी जा सकती?
छांव में बैठे रहे रसूखदार, धूप में तपे नौनिहाल
विद्यालय परिवार के सदस्यों द्वारा इस आयोजन को ‘सफल’ बनाने की जो पीठ थपथपाई जा रही है, उसने यह साफ कर दिया है कि स्कूल के बड़े पदाधिकारी खुद तो छांव और सुरक्षित कोनों में महफूज थे, लेकिन धूप में तपने के लिए सिर्फ और सिर्फ मासूम बच्चों को ही आगे कर दिया गया.
स्थानीय लोगों का अब साफ कहना है कि बच्चों को अच्छा इंसान बनाने से पहले प्रबंधन को खुद एक संवेदनशील संस्थान बनना सीखना होगा. अभिभावकों और प्रबुद्ध नागरिकों ने पुरजोर मांग की है कि बच्चों की जिंदगी को खतरे में डालने वाले ऐसे तमाशों पर तुरंत और मुकम्मल रोक लगनी चाहिए ताकि भविष्य में किसी बच्चे की जान आफत में न पड़े.
तीखा सवाल: नंदी जी की याद शिक्षकों को थी या मासूम बच्चों को?
संत स्टीफेंस विद्यालय प्रबंधन के इस पूरे तमाशे को देखकर अब जनता के बीच से एक बेहद वाजिब और तीखा सवाल उठने लगा है. स्कूल प्रबंधन का दावा है कि यह पूरा आयोजन विद्यालय के संस्थापक स्वर्गीय सी. जे. नंदी की स्मृति में किया गया था.
अब सवाल यह उठता है कि अगर नंदी जी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि और सम्मान प्रकट करना ही था, तो इसके लिए स्कूल के वेतनभोगी शिक्षकों, रसूखदार अधिकारियों और भारी-भरकम फीस वसूलने वाले प्रबंधन के लोगों ने खुद कमर क्यों नहीं कसी? आखिर क्यों स्वर्गीय संस्थापक की याद में धूप में तपने के लिए सिर्फ और खुद के पैरों पर खड़े न होने वाले मासूम स्कूली बच्चों को ही चुना गया?
क्या स्कूल के भारी-भरकम स्टाफ को इस भीषण गर्मी में सड़क पर उतरकर नींबू पानी बांटने में अपनी तौहीन महसूस हो रही थी? जिन बच्चों को अभी धूप-छांव और लू के खतरों की ठीक से समझ तक नहीं है, उन्हें ‘मानव सेवा’ के नाम पर आगे कर देना सीधे तौर पर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ना है.
जागरूक नागरिकों का साफ कहना है कि अगर स्कूल वाकई गंभीर था, तो सभी शिक्षकों को खुद आगे आकर मिसाल पेश करनी चाहिए थी. लेकिन यहां तो कहानी ही उल्टी हो गई. मलाई और वाहवाही लूटने के लिए बड़े अधिकारी छांव में बैठ गए और तपती सड़क पर धूप खाने के लिए उन नौनिहालों को झोंक दिया गया, जो स्कूल प्रबंधन के फैसलों के खिलाफ आवाज भी नहीं उठा सकते.
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