Ranchi: झारखंड में उच्च शिक्षा व्यवस्था को पूरी तरह बदल देने वाली प्रस्तावित “क्लस्टर कॉलेज व्यवस्था” पर फिलहाल रोक लग गई है. मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के हस्तक्षेप के बाद उच्च एवं तकनीकी शिक्षा विभाग अब इस पूरी योजना की दोबारा समीक्षा करेगा. सरकार ने साफ संकेत दिया है कि ऐसी व्यवस्था लागू नहीं होगी जिससे छात्रों को पढ़ाई के लिए दूसरे शहर या दूरस्थ कॉलेजों पर निर्भर होना पड़े.

क्या था ‘वन सब्जेक्ट-वन कॉलेज’ मॉडल?
दरअसल, विभाग ने राज्य के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में संसाधनों के केंद्रीकरण के उद्देश्य से एक नई अकादमिक व्यवस्था तैयार की थी. इसके तहत अलग-अलग कॉलेजों को विशेष विषयों के लिए निर्धारित करने की योजना थी. यानी कुछ कॉलेजों में केवल साइंस, कुछ में आर्ट्स और कुछ में कॉमर्स या प्रोफेशनल कोर्स संचालित करने का प्रस्ताव था. सरकार का मानना था कि इससे शिक्षकों और लैब जैसी सुविधाओं का बेहतर उपयोग हो सकेगा.
सरकार का क्या था उद्देश्य
लेकिन जैसे ही इस प्रस्ताव की जानकारी सार्वजनिक हुई, कई जिलों में इसका विरोध शुरू हो गया. छात्र संगठनों और शिक्षकों ने इसे ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों के लिए परेशानी बढ़ाने वाला कदम बताया. उनका कहना था कि अगर किसी क्षेत्र में सिर्फ एक-दो कॉलेज हैं और वहां विषय सीमित कर दिए गए, तो छात्रों के सामने पढ़ाई छोड़ने जैसी स्थिति बन सकती है.
Read Also: पूर्व सांसद धीरज साहू ने मल्लिकार्जुन खड़गे से की मुलाकात, विभिन्न मुद्दों पर हुई चर्चा
महिला कॉलेजों को लेकर उठे सवाल
महिला कॉलेजों को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए. छात्राओं और अभिभावकों ने आशंका जताई कि मनपसंद विषय दूसरे कॉलेज में शिफ्ट होने पर उन्हें दूर-दराज के संस्थानों में जाना पड़ेगा, जिससे सुरक्षा और अतिरिक्त खर्च की समस्या बढ़ेगी. आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों के छात्रों ने भी कहा कि रोज अलग-अलग कॉलेजों के चक्कर लगाना उनके लिए व्यावहारिक नहीं होगा.
मुख्यमंत्री ने दिए निर्देश
विरोध बढ़ने के बाद मुख्यमंत्री ने विभाग को निर्देश दिया कि प्रस्ताव को जमीनी परिस्थितियों के अनुसार संशोधित किया जाए. खासकर उन प्रखंडों और इलाकों को ध्यान में रखने को कहा गया है जहां उच्च शिक्षा के विकल्प पहले से सीमित हैं. सूत्रों के अनुसार अब ऐसी जगहों को क्लस्टर व्यवस्था से बाहर रखा जा सकता है. नई समीक्षा के बाद सरकार संशोधित प्रस्ताव को कैबिनेट में ला सकती है. माना जा रहा है कि अब शिक्षा सुधार के साथ छात्रों की सुविधा और स्थानीय जरूरतों के बीच संतुलन बनाने पर जोर दिया जाएगा.
