Chaibasa: पश्चिमी सिंहभूम जिले के हाटगम्हरिया प्रखंड अंतर्गत कुसमुण्डा गांव निवासी संजय गागराई ने आधुनिक तकनीक आधारित मत्स्य पालन को अपनाकर ग्रामीण क्षेत्र में आत्मनिर्भरता और आर्थिक सशक्तिकरण की प्रेरणादायक मिसाल पेश की है. प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के सहयोग और जिला मत्स्य कार्यालय के तकनीकी मार्गदर्शन से उन्होंने बायोफ्लॉक तकनीक के माध्यम से उल्लेखनीय सफलता हासिल की है.

पूर्व में संजय गागराई का परिवार मजदूरी, छोटी खेती और बागवानी जैसे कार्यों पर निर्भर था. सीमित आय के कारण परिवार के भरण-पोषण में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था. बेहतर आजीविका और स्थायी आय के उद्देश्य से उन्होंने मत्स्य पालन को अपनाने का निर्णय लिया.
प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना से मिली नई दिशा
प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत उन्हें आधुनिक तकनीकी प्रशिक्षण और वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई गई. योजना के अंतर्गत 7 टैंक आधारित बायोफ्लॉक इकाई स्थापित करने की स्वीकृति दी गई, जिसकी कुल 7.50 लाख रुपये की परियोजना लागत में लगभग 6.37 लाख रुपये की अनुदान राशि प्रदान की गई. इसके बाद उन्होंने आधुनिक मत्स्य इकाई की स्थापना की.
प्रशिक्षण और तकनीकी सहयोग का लाभ लेते हुए संजय गागराई ने पंगास और तिलापिया प्रजाति की मछलियों का उत्पादन शुरू किया. वर्तमान में वे प्रतिवर्ष लगभग 5 से 6 टन मछली उत्पादन कर रहे हैं, जिससे उन्हें सालाना लगभग 2 लाख रुपये से अधिक की शुद्ध आय प्राप्त हो रही है. इससे उनके परिवार की आर्थिक स्थिति में उल्लेखनीय सुधार आया है.
कम पानी में अधिक उत्पादन दे रही बायोफ्लॉक तकनीक
बायोफ्लॉक तकनीक कम पानी और सीमित स्थान में अधिक उत्पादन देने वाली आधुनिक तकनीक मानी जाती है. इसमें कम लागत में बेहतर उत्पादन संभव होता है तथा लाभ की संभावना अधिक रहती है. संजय गागराई द्वारा उत्पादित मछलियों की बिक्री स्थानीय बाजारों में की जा रही है.
जिला दंडाधिकारी-सह-उपायुक्त मनीष कुमार ने कहा कि सरकार की विभिन्न योजनाओं का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों का विस्तार करना और लोगों को आत्मनिर्भर बनाना है. वहीं जिला मत्स्य पदाधिकारी नवीन कुमार ने बताया कि विभाग द्वारा संचालित योजनाओं के माध्यम से लाभुकों को तकनीकी प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता और निरंतर मार्गदर्शन दिया जा रहा है. लाभुक संजय गागराई ने कहा कि मत्स्य विभाग और प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना से मिले सहयोग ने उनके जीवन में सकारात्मक बदलाव लाया है और अब वे आत्मनिर्भर होकर नियमित आय अर्जित कर रहे हैं.
