विनीत आभा उपाध्याय

Ranchi: झारखंड में भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति के तहत ACB ने बड़ी बड़ी कार्रवाई की है. ACB ने भ्र्ष्टाचार के मामलों की जांच के दौरान राज्य के वरीय IAS अधिकारियों से लेकर CO रैंक के अधिकारियों और इंस्पेक्टर से लेकर सिपाही तक को गिरफ्तार किया लेकिन कुछ मामलो में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) द्वारा रंगे हाथों पकड़े गए और गंभीर अनियमितताओं के आरोपी अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए अभियोजन स्वीकृति न मिलना एक बड़ा रोड़ा बन गया है.
अभियोजन स्वीकृति नहीं मिलने के कारण कई गंभीर मामलों में कानूनी कार्रवाई अधर में लटकी हुई है. ऐसे ही कुछ चर्चित मामलों में रांची शहर अंचल के तत्कालीन अंचल अधिकारी (सीओ) मुंशी राम, नामकुम की तत्कालीन सीओ श्वेता वर्मा और गुमला जिले के बिशुनपुर प्रखंड की पंचायत सचिव किरण कुसुम खलखो का नाम शामिल है. ये सभी अधिकारी वर्तमान में एसीबी की जांच के दायरे में हैं लेकिन इनके खिलाफ मुकदमों की सुनवाई ठप पड़ी है.
रंगे हाथों गिरफ्तारी के बाद भी ट्रायल रुका
तत्कालीन सीओ मुंशी राम: इन्हें एसीबी की टीम ने इन्हें 40,000 हजार रुपए की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों गिरफ्तार किया था. इस भ्रष्टाचार के आरोप में उन्हें जेल की हवा भी खानी पड़ी थी, पंचायत सचिव किरण कुसुम खलखो: गुमला के बिशुनपुर में तैनात रहीं किरण कुसुम खलखो को 10,000 हजार रुपए की घूस लेते हुए रंगे हाथों दबोचा गया था. इन्हें भी न्यायिक हिरासत में जेल भेजा गया था, तत्कालीन सीओ श्वेता वर्मा: नामकुम अंचल में पदस्थापना के दौरान नियमों को ताक पर रखकर अवैध रूप से म्यूटेशन (दाखिल-खारिज) करने का गंभीर आरोप है.
इन तीनों ही मामलों की प्रकृति और आरोप भले ही अलग-अलग हों लेकिन इनमें एक हैरान करने वाली समानता है. आरोपियों की गिरफ्तारी हुई वे जेल गए और फिलहाल कुछ आरोपी जमानत पर बाहर भी आ चुके है. इसके बावजूद उनके खिलाफ अदालत में मुकदमा चलाने के लिए अनिवार्य अभियोजन स्वीकृति अब तक प्राप्त नहीं हो सकी है. वैधानिक स्वीकृति के अभाव में एसीबी इन मामलों में ठोस कानूनी तार्किक परिणति तक नहीं पहुंच पा रही है और अदालत में सुनवाई रुकी हुई है.
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